योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 873, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६२
<div align="center"> * योगवाशिष्ठ * </div>दुःख आता जाता है और अमिट है । जब अपना किया कर्म उदय होता है, तब शोक क्यों करे ? हे राम ! जो सत्य है, वह असत्य नहीं और जो असत्य है सो सत्य नहीं । फिर रागद्वेष किस निमित्त करना ? जिसको ऐसा निश्चय हुआ है कि न मैं हूँ, न जगत् है और न पृथ्वी है, वह शोक किसका करे ? जब देह अन्य है और मैं चैतन्य हूँ तो चैतन्य का तो नाश नहीं होता । तब शोक किसका करना ? हे राम ! दुःख तो किसी प्रकार नहीं है; पर जब तक विचार नहीं तब तक दुःख होता है और विचार किये से कोई दुःख नहीं रहता । जो सम्यग्दर्शी मुनीश्वर है, वह सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानता है, इस कारण दुःख नहीं पाता । जो असम्यग्दर्शी है वह अज्ञान से दुःख पाता है । जैसे दिन के अन्त में पृथ्वी-मण्डल शीतल हो जाता है, वैसे ही सम्यग्दर्शी का हृदय शीतल होता है । जिसको कर्तव्य में कर्तृत्व का अभिमान नहीं है, वही सम्यग्दर्शी है ।
हे राम ! जितने जगत् के पदार्थ हैं, उनको हृदय से आभासमात्र जानो और बाहर जैसे आचार हों वैसे करो । अथवा उनका भी त्याग करो और निराभास होकर स्थित होओ । मैं चिदाकाश, नित्य, सर्वज्ञ और सबसे रहित हूँ, ऐसा अभ्यास करके अपने को एकान्त और निर्मल देखोगे । अथवा ऐसी धारणा करो कि न मैं हूँ, न ये भोग हैं, न अर्थरूप जगत् का आडम्बर है । अथवा ऐसे सोचो कि मैं ही नित्य, शुद्ध, चिदात्मा और आकाशरूप सब कुछ हूँ, मुझसे कुछ भिन्न नहीं । मैं अपने आपमें स्थित हूँ । इन दोनों पक्षों में जो इच्छा हो सो ग्रहण करो तो तुमको सिद्धि प्राप्त होगी । जगत् को आभासमात्र जानो, परन्तु यह भी कलङ्करूप है अतः इस चिन्तना को भी त्यागकर निराभास हो । तुम चिदाकाश, नित्य, सर्वव्यापी और सबसे रहित हो; आभास को त्यागकर निर्मल अद्वैत हो रहो, अथवा विधिनिषेध दोनों दृष्टियों का आश्रय करो । हे राम ! क्रिया को करो, परन्तु रागद्वेष से रहित हो । जब रागद्वेष से रहित होगे, तब उत्तम पदार्थ ब्रह्मानन्द को पाओगे; जो सबका अधिष्ठान है, उसको पाओगे । हे राम ! जिसका