योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 874, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ६३
हृदय रागद्वेषरूपी अग्नि से जलता है, उसको सन्तोष वैराग्य आदिक गुण नहीं प्राप्त होते । जैसे दग्ध भूतल के वन में हरिण प्रवेश नहीं करते, वैसे ही रागद्वेषादिकयुक्त हृदय में सन्तोषादिक नहीं प्रवेश करते ।
हे राम ! हृदय कल्पतरु है । ऐसा वृक्ष, जो रागद्वेषादिक सर्पों से रहित है, उसमे कौन पदार्थ है, जो प्राप्त न हो—शुद्ध हृदय से सब कुछ प्राप्त होता है । हे राम ! जो बुद्धिमान् है और शास्त्र का ज्ञाता भी है, परन्तु रागद्वेष-संयुक्त है, वह सियार की तरह नीच है । उसको धिक्कार है । जिन पदार्थों को पाने के निमित्त लोग यत्न करते हैं, वे तो आते-जाते रहते हैं । धन, को इकट्ठा कोई करता है और ले कोई जाता है । तब रागद्वेष किसका करिये ? जो कुछ प्रारब्ध है सो अवश्य होता है, धन का व्यर्थ यत्न क्यों करिये ? बान्धव और वस्त्र आते हैं, और फिर जाते भी हैं । जैसे समुद्र में जलजन्तुओं का आश्रय बुद्धिमान् नहीं लेते, वैसे ही जगत् के पदार्थों का आश्रय ज्ञानवान् नहीं लेते । भाव-अभावरूप परमेश्वर की माया है । संसार की रचना स्वप्न की तरह है । उसमें जो आसक्त होते हैं, उनको वह सर्पिणी की तरह डसता है । धन, बान्धव और जगत् वास्तव में मिथ्या ही हैं, अज्ञान से सत्य भासित होते हैं । हे राम ! जो आदि में न हो और अन्त में भी न रहे, पर मध्य में भासित हो, उसको भी असत्य जानिये । जैसे आकाश में फूल असत्य हैं, वैसे ही, संसार-रचना असत्य है । जैसे संकल्प की रचना असत्य है, जैसे गन्धर्वनगर सुन्दर भासित होता है, पर नष्ट हो जाता है और जैसे स्वप्नपुर दीर्घकाल का भासित होता है, पर भ्रमरूप है, वैसे ही यह जगत् असत्यरूप और भ्रममात्र है; केवल संकल्परूप अभ्यास के वश से दृढ़ता को प्राप्त हुआ है । दीवार जो साकार भासित होती है, वह आकार से रहित प्रकाशरूप है और आत्मपद सुषुप्ति की तरह अद्वैतरूप है । उस सुषुप्ति पद से जीव जब गिरता है, तब दीर्घ स्वप्न को देखता है ।
हे राम ! अज्ञानरूपी निद्रा में जो अपने स्वभाव से गिरा है, वह