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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 875, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 875

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<div align="center">❊ योगवाशिष्ठ ❊</div>

संसाररूपी स्वप्नश्रम को देखता है । जब अज्ञानरूपी निद्रा का अभाव हो, तब यह आत्मराज्य और निर्विकल्प मुदित आत्मपद को प्राप्त होता है । जैसे सूर्य को देखकर कमल प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही ज्ञान से शुभगुण विकसित होते हैं । आत्मरूपी सूर्य सब दुःखों से रहित है । जो पुरुष निद्रा में होता है, वह सूक्ष्म वचनों से नहीं जागता, पर बड़े शब्द करने और जल डालने से जागता है, वैसे ही मैंने मेघ की तरह गरजकर तुम पर वचनरूपी जल की वर्षा की है । ज्ञानरूपी शीत-लता सहित ये वचन हैं उनसे अब तुम ज्ञानरूपी जाग्रत् बोध को प्राप्त हुए । ऐसे ज्ञानरूपी सूर्य से जगत् को भ्रमरूप देखोगे । हे राम ! तुमको न जन्म है, न मृत्यु है, न कोई दुःख है, न भ्रम है । तुम सब संकल्पों से रहित आत्मपुरुष अपने आपमें स्थित हो । तुम्हारी वृत्ति सम, शान्त और सुषुप्ति की भाँति है । तुम अति विस्तृत, सम, शुद्ध और अपने स्वरूप में स्थित हो ।

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इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थ योगोपदेशो नाम चतुर्विंशतितमसर्गः ॥ २४ ॥

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इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा, तब रामजी, सम, शान्त और चेतनतत्त्व में विश्राम पाकर परमानन्द को प्राप्त हुए । समस्त सभा जो बैठी थी, वह भी वशिष्ठजी के वचन सुनकर सम और आत्मसमाधि में स्थित हुई और बोलने का व्यवहार शान्त हो गया । पिंजड़े में जो पक्षी बोलते थे, वे भी शान्त हो गये । वन के जो वानर थे, वे भी वचन सुनकर स्थित हो रहे । सब ओर शान्ति छा गई । जैसे अर्द्धरात्रि के समय भूमि शान्त हो जाती है, वैसे ही सभा के लोग चुप हो रहे और वचनों पर विचारने लगे कि क्या उपदेश मुनीश्वर ने किया है । एक घड़ी तक शान्ति रही ।

उसके अनन्तर फिर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अब तुम सम्यक् प्रबुद्ध हुए हो और अपने आपमें स्थित हो । जो कुछ तुमने जाना है, उसके अभ्यास का त्याग न करना, इसी में दृढ़ रहना । हे राम ! संसार-रूपी चक्र का नाभिस्थान चित्त है । उसी चित्तनाभि के स्थिर होने