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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 876, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 876

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">६५</span>

पर संसारचक्र भी स्थिर हो जाता है। इस संसाररूपी चक्र का बड़ा तीव्र वेग है। रोकने से भी नहीं रुकता। इससे दृढ़ प्रयत्न करके इसको रोकिये। सन्तों के संग और सतशास्त्रों के वचनों से शुद्ध हुई बुद्धि ही इसे रोक सकती है। हे राम! अज्ञान से जो दैव कल्पा है, उसका त्यागकर अपने पुरुषार्थ का आश्रय लो। इसी से परम शान्तपद प्राप्त होता है। ब्रह्मा से लेकर चींटी तक यह अज्ञानरूपी संसारचक्र असतरूप है और भ्रम से सत् की नाईं भासित होता है। इसका त्याग करो। हे राम! असतरूप पदार्थों में जो राग या द्वेष रखते हैं, वे मूर्ख हैं। उनसे तो चित्र-लिखित पुरुष भी श्रेष्ठ है। जब इष्टविषय प्राप्त होता है, तब ये हर्ष से प्रफुल्लित होते और अनिष्ट की प्राप्ति से द्वेष करते हैं; पर चित्र के पुरुष को किसी में रागद्वेष नहीं होता। इस कारण मैं कहता हूँ कि चित्र का पुरुष भी इनसे श्रेष्ठ है। ये आधि-व्याधि से जलते हैं, पर वह सदा ज्यों-का-त्यों है। चित्र का पुरुष तब नष्ट होता है, जब उसके आधार का नाश करिये; अधिष्ठान के नाश बिना उसका नाश नहीं होता। पर मनुष्य का आधार अविनाशी है, उसका नाश नहीं होता। वह मूर्खता से अपने को नष्ट होता मानता है और रागद्वेष से संयुक्त है, इस कारण चित्र के पुरुष से भी तुच्छ है। मनोराज्य संकल्प रूप देह भी इस देह से श्रेष्ठ है; क्योंकि जो कुछ दुःख इसको होते हैं वे बहुत काल तक रहते हैं, पर दुःख और संकल्प के आने से मनोराज्य का अभाव हो जाता है, इससे वह थोड़ा है। संकल्पदेह से भी स्थूलदेह तुच्छ है। हे राम! जो थोड़े समय से देह हुई है; उसमें दुःख भी थोड़ा है और जो दीर्घ संकल्परूपी देह है, वह दीर्घ दुःख को ग्रहण करती है, इससे महानीच है।

हे राम! यह देह भी संकल्पमात्र है। न सत् है, न असत् है; इसके भोग के लिये यत्न मूर्ख करते हैं और क्लेश पाते हैं। देह का अभिमान करके इसके सुख से वे सुखी होते हैं और दुःख से दुःखी। इसके नष्ट होने से आपको नष्ट हुआ मानते हैं। जैसे मनोराज्य का नाश होने से पुरुष का और दूसरे चन्द्रमा का नाश होने से चन्द्रमा का नाश नहीं होता, वैसे ही इस देह का नाश होने पर देही पुरुष का नाश नहीं