योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 877, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
होता। जैसे संकल्प-पुरुष का नाश होने से पुरुष का नाश नहीं होता और जैसे स्वप्नभ्रम के नाश से पुरुष का नाश नहीं होता, वैसे ही देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता। जैसे घनी धूप के कारण रेणुका में जल भासित होता है और भली प्रकार जाकर देखिये, तब जल का अभाव हो जाता है, परन्तु देखनेवाले का अभाव नहीं होता, वैसे ही संकल्प से रचा नश्वर देह के नाश से तुम्हारा नाश तो नहीं होता। हे राम! दीर्घकाल का रचा जो स्वप्नमय देह है, उसके दुःख और नाश से आत्मा को दुःख या उसका नाश नहीं होता। चैतन्य आत्म-सत्ता नष्ट नहीं होती और स्वप्न से चलायमान भी नहीं होती; न विकार को प्राप्त होती है। वह तो सर्वदा शुद्ध और अच्युतरूप अपने आपमें स्थित है और देह के नाश से उसका नाश नहीं होता। अज्ञान के दृढ़ अभ्यास से देह के धर्म अपने में भासित होने लगे हैं। जब आत्मा का दृढ़ अभ्यास हो तो देहाभिमान और देह के धर्मों का अभाव हो जायगा। जैसे कोई चक्र पर चढ़कर घूमता है तो उतरने पर कुछ काल तक घूमता सा लगता है। पर जब चिरकाल व्यतीत होता है, तब स्थिर हो जाता है, इसी प्रकार देहरूपी चक्र पर चढ़ा हुआ जीव अज्ञान से भ्रमा हुआ अपने को भ्रमता देखता है और जब अज्ञान का वेग निवृत्त होता है, तब भी कुछ काल तक देहभ्रम भासित होता है, जिससे जानता है कि मेरा नाश होता है, मुझको दुःख होता है इत्यादिक। यह कल्पना अज्ञान से होती है। पर जब उस भ्रमदृष्टि को धैर्य से निवृत्त करते हैं, तब उसका अभाव हो जाता है।
हे राम! जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प भासता है, वैसे ही आत्मा में देह भासती है। वह असत् और जड़ है। न कर्म करती है और न मुक्त होने की इच्छा करती है। देव परमात्मा भी कुछ नहीं करता। वह सदा शुद्ध द्रष्टा और प्रकाशक है। जैसे निर्वाण दीप अपने आपमें स्थिर होता है, वैसे ही तुम भी शुद्ध स्वरूप अपने आपमें स्थित हो। जैसे सूर्य आकाश में स्थित होता है, पर सब जगत् को प्रकाशित करता है और उसके आश्रय से लोग चेष्टा करते हैं, परन्तु सूर्य कुछ नहीं