योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 878, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६७
करता, वह केवल सबका साक्षी है, वैसे ही आत्मा के आश्रय से देहा- दिक की चेष्टा होती है। परन्तु आत्मा साक्षीरूप और पापपुण्य से रहित है। हे राम ! इस देहरूपी शून्य गृह में अहंकाररूपी पिशाच कल्पित है। जैसे बालक परछाईं में वैताल की कल्पना करके भय पाता है, वैसे ही अहंकाररूपी पिशाच की कल्पना कर जीव भय पाता है। वह अहंकाररूपी पिशाच महानीच है। सब सन्तजन उसकी निन्दा करते हैं। जब अहंकाररूपी वैताल निकले, तब आनन्द हो। देहरूपी शून्य गृह में इसका निवास है। जो पुरुष इसका दास हो रहा है, उसको यह नरक में ले जाता है। इससे तुम इसके दास न होना। जब इसके नाश का उपाय करोगे, तब आनन्द पाओगे। हे राम ! यह चित्तरूपी उन्मत्त वैताल जिसको स्पर्श करता है, उसको अशुद्ध करता है, अर्थात् उसका धैर्य और निश्चय अस्तव्यस्त करके उसे दुःख देता है और निज स्वरूप से गिरा देता है। जो बड़े बड़े साधु-महन्त हैं, वे भी इसके भय से समाधि में स्थित होते हैं कि किसी प्रकार अहंकार का अभाव हो ।
हे राम ! अहंकाररूपी पिशाच जिसको स्पर्श करता है, उसको आप-सा कर लेता है। यह जैसे आप तुच्छ है, वैसे ही और को भी तुच्छ बनाता है। जहाँ सत्संग, सतशास्त्र का विचार और आत्मज्ञान का निवास नहीं होता, उस शून्य और उजाड़ देहमन्दिर में यह रहता है, और जो कोई ऐसे स्थान में प्रवेश करता है उसमें प्रवेश कर जाता है। हे राम ! जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है, उसका धन से कल्याण नहीं होता, और न मित्र-बान्धव से कल्याण होता है। अहं- कार-पिशाच से मिला हुआ जो कुछ कर्म वह करता है, वह अपने नाश के निमित्त करता है और विष की बेलि को उपजाता और बढ़ाता है। हे राम ! जो पुरुषविवेक और धैर्य से रहित है उसको अहं- काररूपी पिशाच शीघ्र ही खा जाता है। वह सर्वरूप है और जिसको स्पर्श करता है, उसको मुर्दा करके छोड़ता है। जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है, वह नरकरूपी अग्नि में काष्ठ की नाईं जलेगा। अहं- काररूपी सर्प देहरूपी वृक्ष के छिद्र में विष से भरा बैठा है। उसके निकट