सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 879, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 879

६८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

जो जायगा, उसको वह मार डालेगा। जो अहं-मम भाव को प्राप्त होगा, वह मृतक-समान होगा और जन्म-मरण पावेगा। अहंकाररूपी पिशाच जिसको लगता है, उसे मलिन करता है और स्वरूप से गिरा-कर संसाररूपी गढ़े में डालता है। बड़ी आपदाएँ उस पर ढाता है। जितनी आपदाएँ हैं, उन्हें अहंकार ढाता है। बहुत वर्षों तक भी उन आपदाओं का वर्णन न हो सकेगा।

हे राम ! यह जो मलिन कल्पनाएँ उठती हैं कि 'मैं हूँ', 'मैं मरता हूँ', 'मैं दग्ध होता हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं मनुष्य हूँ', उनका मूल अहंकार-रूपी पिशाच की शक्ति है। आत्मस्वरूप नित्य, शुद्ध, चिदाकाश, सर्व-गत, सच्चिदानन्द, जीव सबका अपना है, पर अहंकार के वश होकर यह जीव अपने को परिच्छिन्न और निर्लिप्त होकर भी दुःखी मानता है। जैसे आकाश सर्वगत और निर्लेप है, वैसे ही आत्मा सबमें निर्लेप है और सबका सम्बन्धी, पर अहंकार के सम्बन्ध से रहित है। हे राम ! ग्रहण त्याग, चलना, बैठना इत्यादिक जो कुछ कर्म हैं, उन्हें देहरूपी यन्त्र और वायुरूपी रस्सी से अहंकाररूपी यन्त्री कराता है। आत्मा सदा निर्लेप, सबका अधिष्ठान और कारणकार्य भाव से रहित है। जैसे वृक्ष की ऊँचाई का कारण यह आकाश निर्लेप है, वैसे ही आत्मा सर्वचेष्टा का कारण, अधिष्ठान और निर्लेप है। जैसे आकाश और पृथ्वी का सम्बन्ध नहीं, वैसे ही आत्मा और अहंकार का सम्बन्ध नहीं है। चित्त को जो 'आप' जानते हैं वे महामूर्ख हैं। आत्मा प्रकाशरूप, नित्य और सर्वगत विभु है; चित्त मूर्ख, जड़ और आवरण करता है। हे राम ! आत्म सर्वज्ञ और चैतन्यरूप है; पर चित्त मूढ़ और पत्थर सा जड़ है। इसको दूर करो। इसका और तुम्हारा कुछ सम्बन्ध नहीं। तुम इस मोह को त्यागो। देहरूपी शून्य गृह में चित्तरूपी वैताल का निवास है। जिसको वह अपने वश करता है, जिसको बान्धव नहीं छुड़ा सकते, और शास्त्र भी नहीं छुड़ा सकते। जिसका देहाभिमान क्षीण हो गया है, उसको गुरु और शास्त्र भी छुड़ा सकते हैं, जैसे थोड़ी कीचड़ से हरिण को निकाल लेते हैं वैसे ही गुरु और शास्त्र उसे निकाल लेते हैं।