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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 880, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 880

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६६

हे राम ! जितने देहरूपी शून्य मंदिर हैं, उन सबमें अहंकाररूपी पिशाच रहता है। कोई देहरूपी गृह अहंकार-पिशाच से खाली नहीं है। इस पर भय सवार है। जैसे पिशाच अपवित्र स्थान में रहता है, पवित्र स्थान में नहीं, वैसे ही जहाँ सन्तोष, विचार, अभ्यास, सत्सङ्ग से रहित देह है, उसी स्थान में अहंकार निवास करता है। जहाँ सन्तोष, विचार, अभ्यास और सत्संग होता है, वहाँ से वह मिट जाता है। जितने शरीररूपी शमशान हैं, वे चित्तरूपी वैताल से पूर्ण हैं। अपरिमित मोहरूपी वैताल के वश जीव जगतरूपी महावन में मोह को प्राप्त होते हैं, जैसे बालक मोह के वश होता और डरता है। हे राम ! तुम आप अपना उद्धार करो और सत्य विचार करके धैर्य धरो। इस जगतरूपी पुरातन वन में जीवरूपी मृग विचरते हैं और भोगरूपी तृण चरते हैं। पर वे भोगरूपी तृण देखने में तो सुन्दर लगते हैं, परन्तु उनके नीचे गढ्ढा है। जैसे हरियाली और तृण से ढका हुआ गढ्ढा देख मृग के बालक घास चरने लगते हैं और गढ्हे में गिर पड़ते हैं, वैसे ही जीवरूपी मृग भोगों को रमणीय जानकर भोगने लगते हैं और उनकी तृष्णा से नरक आदिक में गिरते और दुःख की अग्नि में जलते हैं। हे राम ! तुम ऐसे न होना। जो कोई भोगों की तृष्णा करेगा, वह नरकरूपी गड्ढे में गिरेगा। इससे तुम मृग-बुद्धि को त्यागकर सिंहवृत्ति को धारण करो। मोहरूपी हाथी को सिंह होकर अपने नखों से विदीर्ण करो और भोग की तृष्णा से रहित बनो। भोग की तृष्णावाले जीव जम्बूद्वीपरूपी जंगल में मृग की तरह भटकते हैं—उनकी तरह तुम न विचरना। हे राम ! स्त्री जो रमणीय लगती है, उसका स्पर्श अल्पकाल ही शीतल और सुखदायक लगता है। परन्तु वह कीचड़ की तरह है। कीचड़ का लेप भी शीतल लगता है, परन्तु तुच्छ है। जैसे दलदल में फँसा हुआ हाथी उसमे निकल नहीं सकता, वैसे ही यह भोगरूपी दलदल में फँसा हुआ जीव नहीं निकल सकता। इसमें तुम सन्त की वृत्ति को ग्रहण करो। ग्रहण करना किसको कहते हैं और त्याग किसका नाम है, ऐसे विचार से असद्वृत्ति को त्याग करो और आत्मतत्त्व का आश्रय लो।