योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 881, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
हे राम ! यह अपवित्र देह अस्थि, मांस, रुधिर से पूर्ण और तुच्छ है। इसका आचार दुष्ट है। देह के निमित्त भोग की इच्छा करने से परमार्थ नहीं सिद्ध होता। देह रची और ने है, यह चेष्टा और से करती है और इसमें प्रवेश और ने किया है। दुःख को ग्रहण और करता है. जो दुःख का भागी होता है। संकल्प ने देह रची है, प्राण से यह चेष्टा करती है, अहंकार-पिशाच ने इसमें प्रवेश किया है और गर्जता है। मन की वृत्ति सुख-दुःख को ग्रहण करती है और जीव दुःखी होता है। यह आश्चर्य है। हे राम ! परमार्थसत्ता एक है और सर्वत्र समान है। इससे भिन्न सत्ता नहीं। जैसे पत्थर घनजड़ होता है और उसमें और कुछ नहीं उपजता, वैसे ही सत्तामात्र से भिन्न दूसरी सत्ता किसी पदार्थ की नहीं है। जैसे पत्थर घनरूप है, वैसे ही परमात्मा घनरूप है। जड़ और चेतन भिन्न नहीं हैं। यह मिथ्या संकल्प की रचना है। जैसे बालक को परछाहीं में बेताल भासता है, वैसे ही सब कल्पना मन की है। जैसे एक ऊख के रस से गुड़, शक्कर इत्यादि बनती है, वैसे ही एक परमोत्तम सत्तासमान सब है। उसमें जड़-चेतन की कल्पना मिथ्या है। जब तक सम्यकदृष्टि नहीं प्राप्त हुई, तब तक जड़-चेतन की दृष्टि होती है और जब यथार्थदृष्टि प्राप्त होती है; तब सब भेदकल्पना मिट जाती है। जैसे सीपी में जो चाँदी भासती है सो न सत्य होती है और न असत्य होती है, वैसे ही आत्मा में जड़-चेतन; सत्य-असत्य की विलक्षण कल्पना है। हे राम ! जो सत्य है वह असत्य नहीं होता और जो असत्य है वह सत्य नहीं होता। आत्मा सदा सत्यरूप और अपने आपमें स्थित है। उसमें द्वैत और एक का अभाव है। जैसे पत्थर में अन्य सत्ता का अभाव है, वैसे ही आत्मा में द्वैतसत्ता का अभाव है। नानारूप भासित होने पर भी द्वैत कुछ नहीं है। वह सदा अनुभवरूप है। उसमें विभागकल्पना कुछ नहीं—सदा अद्वैतरूप है। भेदकल्पना चित्त से भासती है। जब चित्त का अभाव होता है, तब जड़-चेतन की कल्पना मिट जाती है। जैसे बन्ध्या के पुत्र और आकाश में वृक्ष का अभाव है, वैसे ही आत्मा में कल्पना का अभाव है।