योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 882, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण *
हे राम ! यह चेतन है, यह जड़ है, यह उपजता है, यह मिट जाता है इत्यादि सब कल्पना मिथ्या है। जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है, वैसे ही केवल निर्विकल्प चिन्मात्र आत्मा में कल्पना मिथ्या है। गुरु और शास्त्र भी जो आत्मा को चैतन्य और अनात्मा को जड़ कहते हैं, वह भी बोध के निमित्त कहते हैं और दृष्टान्त युक्ति से दृश्य की आत्मस्वरूप में स्थिति कराते हैं। जब स्वरूप में दृढ़ स्थिति होगी, तब जड़-चेतन की भेद-कल्पना जाती रहेगी; केवल अचिन्त्य चिन्मात्र सत्ता भासित होगी, जो तत्त्व है। इस प्रकार गुरु जड़-चेतन के विभाग का उपदेश करते हैं। तो भी मूर्ख नहीं ग्रहण कर सकते। जब प्रथम ही अचिन्त्य-चिन्मात्र-अवाच्यपद का उपदेश करे, तब कैसे ग्रहण करे। हे राम ! और आश्चर्य देखो। चित्त और है, इन्द्रियाँ और हैं, देह और है, देह का कर्त्ता कोई दृष्टिगोचर नहीं होता। देह अहंकार से घिरी है। यह जीव ऐसा मूर्ख है कि देह को अपना रूप जानता है और दुःख पाता है। पर जो विचारवान् पुरुष आत्मपद में स्थित हुए हैं उन महानुभावों को कोई क्रिया दुःखबन्धन में नहीं डाल सकती। जैसे मन्त्र जानने-वाले को सर्प दुःख नहीं दे सकता, वैसे ही ज्ञानवान् को कर्म बन्धन नहीं करते। हे राम ! न तुम शीश हो, न नेत्र हो, न रक्त हो, न मांस हो, न अस्थि आदिक हो, न मन हो और न भूतजात हो। तुम चित्त से रहित चैतन्य केवल चिन्मात्र साक्षीरूप हो। इसीलिए शरीर की ममता त्यागकर नित्य शुद्ध और सर्वगत आत्मस्वरूप में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे देहसत्ताविचारो नाम पञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ २५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी दृष्टि को ऐसे ग्रहण करो और भेद कष्टदृष्टि का त्याग और नाश करो। जब कष्टदृष्टि नष्ट होगी, तब ऐसा आत्मानन्द प्रकट होगा, जिस आनन्द के पाने से अष्टसिद्धि का ऐश्वर्य भी अनिष्ट जानकर त्याग दोगे। अब और ऐसी दृष्टि का वर्णन सुनो जो महामोह का नाश करती है और दुर्लभ कठिन आत्मपद को सुखपूर्वक प्राप्त कराती है, जिसका नाश कभी नहीं होता। इस दृष्टि का