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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 883, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 883

७२ ❇ योगवाशिष्ट ❇

वर्णन दुःख से रहित आनन्दरूप शिवजी से मैंने सुना है। इसे पूर्वकाल में कैलास की कन्दरा में संसारदुःख की शान्ति के लिए अर्धचन्द्रधारी सदाशिव ने मुझसे कहा था। हे राम ! पूर्ण चन्द्रमा की तरह शीतल और प्रकाशमान हिमालय पर्वत का एक शिखर कैलास है, जहाँ गौरी के रमणीय स्थान और मन्दिर हैं, गङ्गा का प्रवाह झरनों से चलता है, पक्षी शब्द करते हैं और मन्द-मन्द सुखदायक पवन चलता है। कुबेर मोर वहाँ विचरते हैं, कल्पवृक्ष लगे हुए हैं और महाउज्ज्वल, शीतल, सुन्दर कन्दरा में मन्दार और तमाल के वृक्ष लगे हुए हैं, जिनमें ऐसे फूल लगे हैं, जैसे श्वेत मेघ हों। वहाँ गन्धर्व और किन्नर आते और गाते हैं और देवताओं के रमणीय सुन्दर स्थान हैं। उस पर्वत पर त्रिनेत्र सदाशिव हाथ में त्रिशूल लिये, गणों से घिरे हुए, अर्धांग में भगवती को लिए बिराजते हैं। सब लोकों के कारण ईश्वर, जिन्होंने कामदेव का गर्व नष्ट किया, षट्मुख सहित स्वामीकार्तिक जिनके पास बैठे हैं और महाभयानक शून्य शमशानों में जिनका निवास है, उन देव की मैंने पूजा की। फिर एक कुटी बनाकर, एक कमण्डलु और फूल और माला पूजन के निमित्त रखे, यथाशास्त्र पुण्य क्रिया से उस कंदरा में तप करने लगा। जलपान करता, फल भोजन करता, विद्यार्थी जो साथ थे उनको पढ़ाता और शास्त्र का अर्थ विचारता था।

ब्रह्मविद्या की पुस्तकों का समूह आगे था। आसपास मृग और उनके बालक विचरते थे। इस प्रकार वेद पढ़ता, ब्रह्मविद्या को विचारता और शास्त्र के अनुसार तप करता मैं कैलास वनकुञ्ज में रहता था। निदान श्रावण बदी अष्टमी की अर्धरात्रि को जब मैं समाधि से उठा तो क्या देखता हूँ कि दसो दिशा काष्ठवत् मौन और शान्तरूप हैं। महातम घिरा है और मन्द-मन्द पवन चलता है। ओस के कन गिरते हैं जैसे पवन हँस रहा हो। उसी समय महाशीतल अमृतरूपी किरणों से चन्द्रमा प्रकाशित होकर ओषधियों को रस से पुष्ट करने लगा। चन्द्रमुखी कमल खिल आये। चकोर अमृत की किरणों को पानकर मानों चन्द्रमारूप हो गये। प्रातःकाल के तारों की तरह मणियाँ ऊपर