योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 884, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ७३
आकर गिरने लगीं और सप्तर्षि सिर पर स्थित हुए–मानो मेरे तप को देखने आये हों। सप्तर्षियों में पिछले जो तीन तारे हैं, उनके मध्य में मेरा मन्दिर है; वहाँ मैं सदा विराजता हूँ। चन्द्रमा से सब स्थान शीतल हो गये और पवन से फूल गिरने लगे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठआश्रमवर्णनं नाम षड्विंशतितमस्सर्गः ॥ २६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! तब मुझको तेज का प्रकाश देख पड़ने लगा। जैसे मन्दराचल पर्वत के मंथन से क्षीरसमुद्र उछल पड़ा है; या हिमालय पर्वत मूर्तिमान स्थित है; या माखन का पहाड़ खड़ा है; या सब शंखों की उज्ज्वलता स्पष्ट स्थित हुई है; या मोतियों का समूह इकट्ठा होकर उड़ने लगा है। वह महातीव्र प्रकाश ऐसा था, मानो गङ्गा का प्रवाह उछलने लगा हो। उस प्रकाश की शीतलता से सब दिशाएँ और उनके किनारे भर गये और मैं देखकर आश्चर्य करने लगा कि क्या असमय ही प्रलय होने लगा। तब मैं बोधदृष्टि से मन में विचारने लगा कि यह क्या है। तब देखा कि देवताओं के गुरु ईश्वर सदाशिव चन्द्रकला को धारण किये और गौरी भगवती का हाथ पकड़े गणों के समूह से घिरे चले आते हैं। उनके कानों में सर्प पड़े थे, कण्ठ में मुण्डों की माला थी, शीश पर जटा थी और उन पर कदम्ब वृक्ष और तमाल वृक्ष के फूल पड़े हुए थे। उनको प्रथम मैंने मन से देखा। मन ही से मन्दार वृक्ष के पुष्प लेकर अर्घ्य पाद्य किया। मन ही से प्रणाम किया और मन ही से प्रदक्षिणा कर अपने आसन से उठ खड़ा हुआ। फिर अपने शिष्य को जगाकर अर्घ्य पाद्य लेकर चला और त्रिनेत्र शिवजी को पुष्प अञ्जली दे और प्रदक्षिणा कर प्रणाम किया।
तब चन्द्रधारी ने मुझको कृपादृष्टि से देखा और सुन्दर मधुर वाणी में कहा—हे ब्राह्मण! अर्घ्य पाद्य ले आओ, हम तुम्हारे आश्रम में अतिथि आये हैं। हे निष्पाप! तुमको कल्याण तो प्राप्त है? तुम मुझको महाशान्तरूप देख पड़ते हो और महासुन्दर उज्ज्वल तप की शोभा तथा तेज से शोभित हो। चलो, हम तुम्हारे आश्रम को चलें। हे राम! फूलों से आच्छादित