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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 885, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 885

७४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

स्थान में सदाशिव बैठे थे; सो ऐसे कहकर उठ खड़े हुए और अपने गणों सहित मेरी कुटी में आये। वहाँ मैंने पुष्प और अर्घ्य से उनके चरणों की पूजा करके फिर हाथों की पूजा की। इसी प्रकार चरणों से लेकर शीश पर्यन्त सब अङ्गों की पूजा की। फिर गौरी भगवती का पूजन करके उनकी सखियों और शिव के गणों को पूजा। हे रामजी! इस प्रकार भक्तिपूर्वक जब मैं पार्वती परमेश्वर का पूजन कर चुका, तब शशिकलाधारी शिवजी ने शीतल वाणी से मुझसे कहा कि हे ब्राह्मण! नाना प्रकार की बिन्तनेवाली जो चित्तवृत्ति है, वह तुम्हारे स्वरूप में विश्रान्ति को प्राप्त हुई है और तुम्हारी संवित् आत्मपद में स्थित हुई है। तुम्हारे शिष्यों का कल्याण तो है और तुम्हारे पास जो हरिण विचरते हैं, वे भी सुख में हैं? मन्दार वृक्ष तुमको पूजा के निमित्त फूल-फल भली प्रकार देते हैं और गङ्गाजी तुमको भली प्रकार स्नान कराती हैं? देह के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में तुमको खेद तो नहीं होता? इस पर्वत में कुबेर के अनुचर यक्ष और राक्षस जो रहते हैं, वे तुमको दुःख तो नहीं देते और मेरे गण जो निशाचर हैं, वे तो तुमको कष्ट नहीं पहुँचाते?

हे रघुनन्दन ! इस प्रकार जब देवेश ने मुझसे वाञ्छित प्रश्न किये, तब मैंने उनसे कहा—हे कल्याणरूप महेश्वर ! जो तुमको सदा स्मरण करते हैं, उनको इस लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो पाना कठिन हो। उनको भय भी किसी का नहीं। जिनका चित्त तुम्हारे स्मरण के आनन्द में सब ओर से पूर्ण हुआ है, वे जगत में दीन नहीं होते। वही देश उन्हीं जनों के चरण और वही दिशा तथा पर्वत वन्दना करने के योग्य हैं, जहाँ एकान्त बुद्धि से बैठकर तुम्हारा स्मरण होता है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण पूर्वपुण्यरूपी वृक्ष का फल है, जो वर्तमान कर्मों से सिंचता है। तुम मन के परम मित्र हो। तुम्हारा स्मरण सब आपदाओं को हरनेवाला है। वह सर्व सम्पदारूपी लता को बढ़ानेवाला वसन्तऋतु है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण बड़ी महिमा और बड़े से बड़े कर्मों के कारण का भी कारण है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण विवेकरूपी