योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७५
समुद्र में परमार्थरूपी रत्न है; अज्ञानरूपी तम का नाशकर्ता सूर्य का समूह है; ज्ञान-अमृत का कलश, धैर्यरूपी चाँदनी का चन्द्रमा और मोक्ष का द्वार है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण अपूर्व उत्तम दीपक है । वह चित्त का मन्दिर जो संसार है, उस सबको प्रकाशित करता है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण उदार चिन्तामणि की नाईं सब आपदाओं को निवृत्त करनेवाला और बड़े उत्तम पद को देनेवाला है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण एक क्षण भी चित्त में स्थित हो तो सब दुःख और भय नष्ट करता है और वरदायक है । उसके बल से मैं भी तुम्हारी भाँति सुख से बसता हूँ ।
वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब मुनीश्वर ने कहा, तब दिन का अन्त हुआ । सब लोग परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये और सूर्य की किरणों के उदय के साथ फिर अपने अपने आसन पर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रुद्रवशिष्ठसमागमो नाम सप्तविंशतितमस्सर्गः ॥ २७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मैंने इस प्रकार कहा, तब गौरी भगवती जगत्-माता, जैसे माता पुत्र से कहे, मुझसे बोलीं—हे वशिष्ठ ! पतिव्रताओं में मुख्य अरुन्धती कहाँ है ? उसको ले आओ । वह मेरी प्यारी सखी है । उससे मैं कथा-वार्ता करूँगी । हे रामजी ! इस प्रकार जब मुझसे पार्वती ने कहा, तब मैं शीघ्र ही जाकर अरुन्धती को ले आया । वे दोनों परस्पर कथा-वार्ता करने लगीं । मैंने विचारा कि मुझको ईश्वर मिले हैं और पूछने का अवसर भी पाया है, इससे सर्व ज्ञान के समुद्र से पूछकर संदेह दूर करूँ । हे राम ! ऐसे विचार करके मैंने गौरीश से जो पूछा और जो कुछ चन्द्रकलाधारी ने मुझसे कहा, वह तुमसे कहता हूँ । मैंने पूछा, हे भगवन् ! तुम भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों के ईश्वर और सब कारणों के कारण हो । तुम्हारे प्रसाद से मैं कुछ पूछने को समर्थ हुआ हूँ । हे महादेव ! जो कुछ मैं पूछता हूँ, उसे प्रसन्नबुद्धि हो, उद्वेग को त्याग कर, शीघ्र ही कहौ ।