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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 887, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 887

७६ $$\text{❊ योगवाशिष्ठ ❊}$$

हे सब पापों के नाशक और सब कल्याण की वृद्धि करनेवाले ! देव-अर्चन का विधान मुझसे कहो ।

ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण ! जो उत्तम देव-अर्चन है और जिसके किये से संसारसमुद्र से जीव तर जाता है, सो सुनो । हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ! पुण्डरीकाक्ष विष्णु देव नहीं और त्रिलोचन शिव भी देव नहीं । कमल से उपजा ब्रह्मा भी देव नहीं और सहस्रनेत्र इन्द्र भी देव नहीं । न देव पवन है, न सूर्य है, न अग्नि है, न चन्द्रमा है, न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न तुम हो, न में हूँ, न देह है, न चित्त है और न कलनारूप है । अकृत्रिम, अनादि, अनन्त और संवित्रूप ही देव कहाता है । आकारा-दिक परिच्छिन्नरूप हैं, वे वास्तव में कुछ नहीं । एक अकृत्रिम, अनादि, अनन्त, चैतन्यरूप देव हैं । वही देव शब्द का वाचक है और उसी का पूजन पूजन है । उस देव को, जिससे यह सब हुआ है और जो सत्ताशान्त-आत्मरूप है, सर्वत्र व्याप्त देखना ही उसका पूजन है पर जो उस संवित्तत्त्व को नहीं जानते, उनके लिए साकार की अर्चना का विधान है । जैसे जो पुरुष योजनपर्यन्त नहीं चल सकता, उसको एक कोस दो कोस का चलना भी भला है, वैसे ही जो पुरुष अकृत्रिम देव की पूजा नहीं कर सकता, उसको साकार का पूजना भी भला है । हे ब्राह्मण ! जिसकी भावना कोई करता है, उसके फल उसी के अनुसार भोगता है । जो परिच्छिन्न (खण्डित) की उपासना करता है, उसको फल भी परिच्छिन्न प्राप्त होता है और जो अकृत्रिम, आनन्द-रूप, अनन्त देव की उपासना करता है, उसको वही परमात्मरूपी फल प्राप्त होता है । हे साधो ! अकृत्रिम फल को त्याग कर जो कृत्रिम को चाहते हैं, वे ऐसे हैं जैसे कोई मन्दार वृक्ष के वन को त्याग कर कंटक के वन को प्राप्त हो । वह देव कैसा है, उसकी पूजा क्या है और क्योंकर होती है, सो सुनो ।

बोध, साम्य और शम, ये तीन फूल हैं । बोध सम्यक्ज्ञान का नाम है; अर्थात् आत्मतत्त्व को ज्यों का त्यों जानना । साम्य मनमें पूर्ण देखने को कहते हैं और शम का अर्थ यह है कि चित्त को निवृत्त