योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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करना और आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ न देखना । इन्हीं तीनों फूलों से चिन्मात्र शुद्ध देव शिव की पूजा होती है; आकार की अर्चना से अर्चा नहीं होती । चिन्मात्र आत्मसंवित् को त्यागकर और जड़ की जो अर्चना करते हैं, वे चिरकाल पर्यन्त क्लेश के भागी होते हैं । हे ब्राह्मण ! जो ज्ञात-ज्ञेय पुरुष हैं, आत्मध्यान से भिन्न पूजन-अर्चन को बालक की क्रीड़ा सा मानते हैं । आत्मा भगवान् एक देव है । वही शिव और परम कारणरूप है । उसका सर्वदा ज्ञान-अर्चन से पूजन करो । और कोई पूजा नहीं है । चैतन्य, आकाश और निरवयव स्वभाव एक आत्मदेव को जानो । पूज्यपूजक और पूजा त्रिपुटी से आत्मदेव की पूजा नहीं होती । मैंने पूछा, हे भगवन् ! चैतन्य आकाशमात्र आत्मा को कैसे जगत् और चैतन्य को कैसे जीव कहते हैं, सो कहो ।
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! चैतन्य आकाश प्रसिद्ध है । वह प्रकृति से रहित है । जो महाकल्प में शेष रहता है, वह आप ही किंचनरूप होता है । उसी किंचन से यह जगत् होता है । जैसे स्वप्न में चिदात्मा ही सर्वगत जगतरूप होकर भासता है, वैसे ही जाग्रत् जगत् भी चिदाकाशरूप है । आदि सर्ग से लेकर इस काल पर्यन्त आत्मा से भिन्न पदार्थ का अभाव है । जैसे स्वप्न में जो जगत् भासता है, सो भी सब चिदाकाशरूप है, भिन्न कल्पना कोई नहीं । चिन्मात्र ही पहाड़रूप है, चिन्मात्र ही जगत् है, चिन्मात्र ही आकाश है, चिन्मात्र ही सब जीव है, और चिन्मात्र ही सब भूत है, चिन्मात्र से भिन्न कुछ नहीं । सृष्टि के आदि से अन्त पर्यन्त जो कुछ द्वैतकल्पना भासती है, सो भ्रममात्र है । जैसे स्वप्न में कोई किसी के अङ्ग काटे सो वास्तव में काटता तो नहीं, निद्रा-वेश से ऐसा लगता है, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी भ्रममात्र है । हे मुनीश्वर ! आकाश, परमाकाश और ब्रह्माकाश, तीनों एक ही के पर्याय हैं । जैसे स्वप्न में संकल्परूप माया से जो अनुभव होता है सो सब चिदाकाश है, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् चिदाकाशरूप है । जैसे स्वप्नपुर आकाश में भिन्न नहीं होता, वैसे जाग्रत् स्वप्न भी आत्मतत्त्व होकर भासित होता है, आत्मा