योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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से भिन्न वस्तु नहीं है। हे मुनीश्वर ! जैसे स्वप्न में चिदाकाश ही घट, पट आदि के रूप में भासित होता है, वैसे ही स्थिति-प्रलयादि जगत् चिदात्मा से भिन्न नहीं है; आत्मा ही ऐसे भासित होता है। जैसे शुद्ध संवित् मात्र से भिन्न स्वप्न में नगर नहीं पाया जाता, वैसे ही जाग्रत् में अनुभव से भिन्न कुछ नहीं पाते। हे मुनीश्वर ! जगत् जो तीनों कालों में भाव-अभावरूप पदार्थ होकर भासित होता है, सो सब चिदाकाशरूप है, आत्मा से भिन्न नहीं। हे मुनीश्वर ! यह देव का रूप मैंने तुमसे परमार्थ कहा है। तुम में और सर्वभूत जाति जगत् में सबका जो देव है, वह चिदाकाश परमात्मा है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे संकल्प-पुर में चिदाकाश ही शरीररूप से भासित होता है, उससे भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह सब चिदाकाशरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने जगत्परमात्म-रूपवर्णनन्नामाष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण ! इस प्रकार यह सब विश्व केवल परमात्मारूप है। परमात्माकाश ब्रह्म ही एक देव कहलाता है, उसी का पूजन सार है और उसी से सब फल प्राप्त होते हैं। वह देव सर्वज्ञ है और सब उसमें स्थित हैं। वह अकृत्रिम देव अज, परमानन्द और अखण्डरूप है। उसको साधना करके पाना चाहिए, जिससे परम सुख प्राप्त होता है। हे मुनीश्वर ! तुम जागे हुए हो, इस कारण मैंने तुमसे इस प्रकार की देव अर्चना कही है। पर जो असम्यग्दर्शी बालक हैं, जिनको निश्चयात्मक बुद्धि नहीं प्राप्त हुई, उनके लिए धूप, दीप, पुष्प, चन्दन आदिक से अर्चना कही है और आकार कल्पित करके देव की मिथ्या कल्पना की है। हे मुनीश्वर ! अपने संकल्प में जो देव बनाते हैं और उसको पुष्प, धूप, दीपादिक से पूजते हैं, सो भावनामात्र है। उससे उनको संकल्परचित फल की प्राप्ति होती है। यह बाल-बुद्धि की अर्चना है। तुम जैसों की वही पूजा है, जो तुमसे सर्व आत्म-भावना में मैंने कही है। हे मुनीश्वर ! हमारे मन में तो देव और कोई नहीं; एक परमात्मा देव ही तीनों भुवनों में है। वही देव शिव और सर्वपद से अतीत है। वह सब संकल्पों से रहित है।