योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 890, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ {#page-76}
सब संकल्पों का अधिष्ठान भी वही है। वह देश-काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित और सब प्रकार शान्तरूप एक चिन्मात्र निर्मल-स्वरूप है। वही देव कहलाता है। हे मुनीश्वर ! जो संवित्सत्ता पञ्चभूत-कला से अतीत और सब भावों के भीतर स्थित है, वही सबको सत्ता देनेवाला देव है। सबकी सत्ता हरनेवाला भी वही है।
हे ब्राह्मण ! जो ब्रह्म सत्य-असत्य के मध्य और सत्य-असत्य के परे कहाता है, वही देव परमात्मा है। जो परम स्वतः सत्तास्वभाव से सबको प्राप्त हुआ है और महाचित्त कहाता है, वही परमात्म देव सत्ता है। जैसे सब वृक्षों व लताओं के भीतर रस स्थित है, वैसे ही समान सत्ता रूप से परमचेतन आत्मा सर्वत्र स्थित है। जो चैतन्यतत्त्व अरुन्धती का है और चैतन्यतत्त्व तुम निष्पाप मुनि का और पार्वती का है, वही चैतन्यतत्त्व मेरा है। वही चैतन्यतत्त्व त्रिलोकी मात्र का है, वही देव है और कोई देव नहीं। हाथ-पाँव से युक्त जिस देव की कल्पना करते हैं, वह चिन्मात्र सार नहीं है। चिन्मात्र ही सब जगत् का सारभूत है और वही अर्चना करने योग्य है। उससे सब फलों की प्राप्ति होती है। वह देव कहीं दूर नहीं और किसी प्रकार किसी को प्राप्त होना भी कठिन नहीं। जो सबकी देह में स्थित और सबका आत्मा है, वह दूर कैसे हो और कठिनता से कैसे प्राप्त हो। सब क्रिया वही करता है। भोजन, भरण और पोषण वही करता है। वही श्वास लेता है। सबका ज्ञाता भी वही है। वह पुर्यष्टका में प्रतिबिम्बित होकर प्रकाशित होता है। जैसे पर्वत पर जो चर-अचर की चेष्टा होती है और चलते बैठते और स्थित होते हैं, उन सबका आधारभूत पर्वत है, वैसे ही मन सहित षट्इन्द्रियों की चेष्टा आत्मा के आश्रय में होती है। उसी की संज्ञा व्यवहार के निमित्त तत्त्ववेत्ताओं ने देव कल्पित की है। एकदेव, चिन्मात्र, सूक्ष्म, सर्वव्यापी, निरञ्जन, आत्मा, ब्रह्म इत्यादि नाम ज्ञानवानों ने उपदेशरूप व्यवहार के निमित्त रक्खे हैं। हे मुनीश्वर ! जो कुछ विस्तार सहित जगत् भासता है, उस सबका वह प्रकाशक है और सबसे रहित भी है। वह नित्य, शुद्ध और अद्वैतरूप है और सब जगत् में अनुस्यूत