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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 891, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 891

८० * योगवाशिष्ठ *

है । जैसे वसन्तऋतु में नाना प्रकार के फूल और वृक्ष दिखते हैं, पर सबमें एक ही रस व्याप रहा है और अनेक रूप भासित होता है, वैसे ही एक ही आत्मसत्ता अनेक रूप देख पड़ती है ।

हे मुनीश्वर ! जो कुछ जगत है सो सब आत्मा का चमत्कार है और आत्मतत्त्व में ही स्थित है । कहीं आकाश, कहीं जीव, कहीं चित्त और कहीं अहंकाररूप है । कहीं दिशारूप, कहीं द्रव्य, कहीं भाव-विकार, कहीं तम, कहीं प्रकाश और कहीं सूर्य, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदिक स्थावर जङ्गमरूप होकर स्थित है । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले होते हैं, वैसे ही एक परमात्मा देव में त्रिलोकी है । हे मुनीश्वर ! देवता, दैत्य, मनुष्य आदि सब एक देव में रहते हैं । जैसे जल में तृण बहते हैं, वैसे ही परमात्मा में जीव रहते हैं । वही चैतन्यतत्त्व चतुर्भुज होकर दैत्यों का नाश करता है, जैसे जल मेघरूप होकर धूप को रोकता है । वही चैतन्यतत्त्व त्रिनेत्र, मस्तक पर चन्द्र धारण किये, वृषभ पर आरूढ़, पार्वतीरूप कमलिनी के मुख का भँवरा बना रुद्र होकर स्थित होता है । वही चेतना विष्णुरूपसत्ता है, जिसके नाभि-कमल से ब्रह्मा, त्रिलोकी, वेदत्रयरूप कमलिनी की लता बढ़ी होकर स्थित हुई है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार एक ही चैतन्यतत्त्व अनेक रूप होकर स्थित हुआ है । जैसे एक ही रस अनेक रूप होता है और जैसे एक ही सुवर्ण अनेक भूषण बनता है, वैसे ही एक ही चैतन्य अनेक रूप होकर दिखता है । इससे सब देह एक चैतन्यतत्त्व की हैं । जैसे एक वृक्ष के अनेक पत्ते होते हैं, वैसे एक ही चैतन्य की सब देह हैं । वही चैतन्य मस्तक पर चूड़ामणि धारनेवाला त्रिलोकपति इन्द्र है । देवतारूप होकर वही स्थित हुआ है और दैत्यरूप होकर भी वही स्थित है । मरने और उपजने का रूप भी वही रखता है । जैसे एक समुद्र में जो तरङ्ग के समूह उपजते और मिट जाते हैं, सो सब जलरूप ही हैं, वैसे ही उत्पत्ति और विनाश चैतन्य में होता है । वह चैतन्यरूप परमात्मा एक ही वस्तु है ।

हे मुनीश्वर ! चैतन्यरूपी आदर्श में जगतरूपी प्रतिबिम्ब पड़ता है