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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 892, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 892

निर्वाण प्रकरण ❇ ८१

और अपनी रची हुई वस्तु को आप ही ग्रहण करके अपने में धारण करता है । जैसे गर्भिणी स्त्री अपने गर्भ को धारण करती है, वैसे ही चैतन्यतत्त्व जगतरूप प्रतिबिम्ब को धारण करता है । हे मुनीश्वर ! सब क्रियाएँ उसी देव से सिद्ध होती हैं और सूर्यादिक उसी से प्रकाश देते और प्रफुल्लित होते हैं । जैसे नील और रक्त कमल सूर्य से प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही आत्मा में अन्धकार और प्रकाश, दोनों सिद्ध होते हैं । हे मुनीश्वर ! त्रिलोकीरूप धूल चेतनरूपी वायु से उड़ती है । जो कुछ जगत् के आरम्भ हैं, उन सबको चैतन्यरूपी दीपक प्रकाशित करता है । जैसे जल सींचने से बेल प्रफुल्लित होती है और फूल-फल उत्पन्न करती है वैसे ही चैतन्यसत्ता सब पदार्थों को प्रकट और सबको सत्ता देकर सिद्ध करती है । हे मुनीश्वर ! चैतन्य ही में जड़ की सिद्धि और चेतन ही में जड़ का अभाव होता है । जैसे प्रकाश ही से अन्धकार सिद्ध होता है और प्रकाश ही से अन्धकार का अभाव होता है, वैसे ही सब देह चैतन्य से सिद्ध होते हैं और चैतन्य ही देहों का अभाव होता है । विष्णु भी उसी में होते हैं और शिवजी भी उसी में होते हैं । हे मुनीश्वर ! ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो चैतन्य बिना सिद्ध हो । जो कोई पदार्थ है सो आत्मा ही से सिद्ध होता है ।

हे मुनीश्वर ! शरीररूपी सुन्दर वृक्ष की बड़ी ऊँची डालें हैं, परन्तु चैतन्यरूपी मञ्जरी बिना वह नहीं सोहता । जैसे रस बिना वृक्ष नहीं सोहता, वैसे ही चैतन्य बिना शरीर नहीं सोहता । बढ़ना, घटना आदि जो विकार हैं, वे एक आत्मा से ही सिद्ध होते हैं । यह सब जगत् चैतन्यरूप है और चैतन्यमात्र ही अपने आपमें स्थित है । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार अमृतरूपी वाणी से त्रिनेत्र ने मुझसे कहा, तब मैंने नम्रता से पूछा—हे देव ! जब सब जगत् चैतन्य व्यापकरूप देव है और चैतन्य ही बड़े विस्तार को प्राप्त हुआ है, तब यह प्रथम चेतन था, अब यह चेतनता से रहित है, इस कल्पना का सब लोकों में प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होता है ? ईश्वर बोले, हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ । यह महाप्रश्न तुमने किया है । इसका उत्तर सुनो ।

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 892, कुल 1734 में से · BharatKosha