योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 893, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
इस शरीर में दो चेतन स्थित हैं। एक चैतन्योन्मुखत्वरूप है और दूसरा निर्विकल्प आत्मा। जो चेतन चैतन्योन्मुखत्व दृश्य से मिला हुआ है, वह जीव संकल्प के फुरने से अन्य की भाँति हो गया है, पर वास्तव में और कुछ नहीं हुआ, केवल दृश्य संकल्प के अनुभव को ग्रहण करने से वही जीवरूप हुआ है। जैसे स्त्री अपने शीलधर्म को त्यागकर दुराचारिणी हो जाती है तो उसकी शीलता जाती रहती है, परन्तु स्त्री का स्वरूप नहीं जाता, वैसे ही चैतन्योन्मुखत्व मे अनुभवरूपी जीवरूप हो जाता है, परन्तु चैतन्यस्वरूप का त्याग नहीं करता। जैसे संकल्प के वश से पुरुष एक क्षण में और रूप हो जाता है, वैसे ही चित्तसत्ता फुरने के भाव से अन्य रूप हो जाती है।
हे मुनीश्वर ! आदि में चित्त का स्पन्दन चित्कला में हुआ है। तब शब्द के चेतने से आकाश हुआ। फिर स्पर्श तन्मात्रा के चेतने से वायु प्रकट हुआ। इसी प्रकार पाँचों तन्मात्राओं के चेतने से पञ्चतत्त्व हुए। फिर देश आदि का विभाग हुआ, उसमें जीव प्रतिबिम्बित हुआ। फिर निश्चयवृत्ति हुई। उसका नाम बुद्धि हुआ। फिर अहंवृत्ति चेती। उसका नाम अहंकार हुआ। फिर संकल्प-विकल्पवृत्ति चेती। उसका नाम मन हुआ। चिन्तना से चित्त हुआ। फिर संसार की भावना हुई। तब संसार का अनुभव हुआ और अभ्यास-वश संसार भासित होने लगा। जैसे विपर्ययभावना करके ब्राह्मण अपने को चाण्डाल जाने, वैसे ही भावना के विपर्यय से वही चैतन्य अपने को जीव मानने लगा है। संकल्प की दृढ़ता से वही चैतन्य चेतनरूपी जीवरूप को ग्रहण कर संकल्प में बरतता है और अनन्त संकल्पों से जड़ता तीव्रता को प्राप्त होकर जड़भाव को ग्रहण कर देहभाव को प्राप्त होती है। जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफ बन जाता है, वैसे ही चैतन्य जब अनन्त संकल्पों से जड़ देहभाव को प्राप्त होता है, तब चित्त मन मोहित हो जड़ता का आश्रय करके संसार में जन्म लेता है और मोह के कारण तृष्णा से पीड़ित होता और काम, क्रोधसंयुक्त भाव-अभाव को प्राप्त होता है। एवं अपनी अनन्तता को त्यागकर परिच्छिन्न व्यवहार में