योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 894, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८३
बरतता है; दुःखदायक अग्नि से तप्त हो शून्यभाव को प्राप्त होता है और भेद को ग्रहण करके महादीन हो जाता है ।
हे मुनीश्वर ! मोहरूपी गड्ढे में जीवरूपी हाथी फँसा है और भाव-अभाव से सदा चलायमान होता है। जैसे जल में तृण बहता है, वैसे ही असाररूप संसार में विकारसंयुक्त जीव रागद्वेष से तपता रहता है, शान्ति कभी नहीं पाता। जैसे जत्थे से बिछुड़ा मृग कष्ट पाता है, वैसे ही आवरणरूप जन्म-मरण से जीव कष्ट पाता है और अपने संकल्प से आप ही भय पाता है। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना कर आप ही भय पाता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भयभीत होता है और संकट में पड़ता है। आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ जीव कष्ट पर कष्ट पाता है और कर्मों को करके संतप्त होता हुआ अनेक जन्म पाता है और भयातुर रहता है। बालपन में महादीन और परवश होता है। यौवन की अवस्था में कामादिक के वश हुआ स्त्री में रत रहता है और वृद्ध अवस्था में चिन्ता-मग्न होता है। जब मृतक होता है, तब कर्म-वश फिर जन्म लेता और गर्भ में दुःख पाता है। फिर बालक, यौवन, वृद्ध और मृतक अवस्था को पाता है। स्वरूप से गिरा हुआ जीव इसी प्रकार भटकता है, कदापि स्थिर नहीं होता।
हे मुनीश्वर ! एक चित्सत्ता स्पन्दनभाव से अनेक भावों को प्राप्त होती है। कहीं दुःख से रुदन करती है, कहीं दुःख भोगती है। कहीं स्वर्ग में देवाङ्गना, पाताल में नागिनी, असुरों में असुरी, राक्षसों में राक्षसी, वनकोट में वानरी, सिंहों में सिँही, किन्नरों में किन्नरी, हरिणों में हरिणी, विद्याधरों में विद्याधरी, गन्धर्वों में गन्धर्वी, देवताओं में देवी इत्यादि जो रूप रचती है सो चैतन्योन्मुखत्व जीवकाल है। क्षीर-समुद्र में वह विष्णुरूप होकर स्थित होती है। ब्रह्मपुरी में ब्रह्मारूप होती है। पञ्चमुख होकर रुद्र होती है और स्वर्ग में इन्द्र होती है। तीक्ष्णकला से दिन का कर्त्ता सूर्य होती है और क्षण, दिन, मास, वर्ष का विभाग करती है। वही चन्द्रमा होकर रात्रि करती और काल होकर