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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 895, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 895

८४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

नक्षत्रमंडल को घुमाती है । कहीं प्रकाश, कहीं तम, कहीं बीज, कहीं पाषाण, कहीं मन होती है । कहीं नदी होकर बहती है, कहीं फूल होकर फूलती है, कहीं भँवर होकर सुगन्ध लेती है, कहीं फल होकर दिखती है, कहीं वायु होकर चलती है, कहीं अग्नि होकर जलाती है, कहीं बरफ बनती है और कहीं आकाश होकर देख पड़ती है । हे मुनीश्वर ! इसी प्रकार सर्वगत सर्वात्मा सर्वशक्तिसत्ता से एक ही रूप चित्शक्ति और आकाश से भी निर्मल है । जीव जैसे चेतता है, वैसा ही होकर स्थित हुआ है । जैसी-जैसी भावना करता है, शीघ्र ही उसका वैसा रूप हो जाता है । परन्तु वह स्वरूप से भिन्न नहीं होता । जैसे समुद्र में फेन तरङ्ग होकर बहते हैं, परन्तु जल से भिन्न नहीं—जल ही जल हैं, वैसे ही चित्शक्ति अनेक रूपों को रखती है, परन्तु चैतन्य से भिन्न नहीं होती । चित्शक्ति ही कहीं हंस, कहीं काक, कहीं शूकर, कहीं मक्खी, चिड़िया इत्यादि रूप रखकर संसार में प्रवृत्त होती है । जैसे जल में पड़ा तृण भ्रमता है, वैसे ही भ्रमती है और अपने संकल्प से आप ही भय पाती है । जैसे गधा अपना शब्द सुन आप ही दौड़ता है और भय पाता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भय पाता है ।

हे मुनीश्वर ! यह मैंने जीवशक्ति का आचार तुमसे कहा । इसी आचार को ग्रहण करके बुद्धि नीच पशुधर्मिणी हुई है और स्वरूप के प्रमाद से जैसा-जैसा संकल्प करती है वैसी ही वैसी कर्मगति को प्राप्त हो शोकातुर होती है, अनन्त दुःख पाती है और अपने मोह से ही मलिन होती है । जैसे भूसी से ढका चावल-कूँडा पीटा जाता है; फिर फिर बोया जाता है; फिर फिर उगता है और काटा जाता है, वैसे ही स्वरूप के आवरण से, दुर्भाग्य से जीवकला जन्म-मरण के दुःख को प्राप्त होती है । जैसे भर्त्ता रहित स्त्री शोक से व्याकुल होती है, वैसे ही जीवकला कष्ट पाती है । हे मुनीश्वर ! जड़दृश्य और अनात्मरूप में प्रीति करने और जिन स्वरूप के विस्मरण मे आशारूपी फाँसी से बँधा हुआ चित्त जीव को नीच योनि में पहुँचाता है । जैसे घटीयन्त्र कभी नीचे जाता