योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 896, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right;">८५</span>
है और कभी ऊपर को, वैसे ही जीव आशा के वश कभी पाताल और कभी आकाश को जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठेश्वरसंवादे चैतन्यो- न्मुखत्वविचारो नामैकोनत्रिंशत्तमसर्गः ॥ २९ ॥
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! स्वरूप के विस्मरण से जो इस प्रकार होता है कि मैं मारनेवाला हूँ, मैं दुखी हूँ, सो अनात्मा में अहं प्रतीति करके ही जीव दुःख का अनुभव करता है । जैसे स्वप्न में पुरुष अपने को पर्वत से गिरता देख दुखी होता है और अपने को मृतक देखता है, वैसे ही जीव स्वरूप के प्रमाद से अनात्मा में आत्म-अभिमान करके आपको दुखी देखता है । हे मुनीश्वर ! शुद्ध चैतन्यतत्त्व में जो चित्तभाव हुआ है, वही चित्तकला चेतने से जगत् का कारण हुआ है, परन्तु वास्तव में स्वरूप से भिन्न नहीं है । जैसे-जैसे चित्तकला चेतती गई है, वैसे ही वैसे जगत् होता गया है । वह चित्त का कारण भी नहीं हुआ और जब कारण ही नहीं हुआ, तब कार्य किसको कहिये ? हे मुनीश्वर ! न वह चित्त है, न चेतन है, न चेतनेवाला है, न द्रष्टा है, न दृश्य है और न दर्शन है; जैसे पत्थर में तेल नहीं होता । न कारण है, न कर्म है और न कारण इन्द्रियाँ हैं; जैसे चन्द्रमा में श्यामता नहीं होती । न वह मन है और न मानने योग्य दृश्य वस्तु है, जैसे आकाश में अंकुर नहीं होता । न वह अहंता है, न तम है और न दृश्य है; जैसे शंख को श्यामता नहीं होती । हे मुनीश्वर ! न वह विविध या अनेक है, न विविधता-रहित एक है; जैसे अणु में सुमेरु नहीं होता । न वह शब्द है, न स्पर्श का अर्थ है; जैसे मरुस्थल में बेल नहीं होती । न वस्तु है, न अवस्तु है; जैसे बरफ में उष्णता नहीं होती । न शून्य है, न अशून्य है, न जड़ है, न चेतन है; जैसे सूर्यमण्डल में अन्धकार नहीं होता । हे मुनीश्वर ! शब्द और अर्थ इत्यादि की कल्पना भी उसमें नहीं; जैसे अग्नि में शीतलता नहीं होती । वह तो केवल केवलीभाव अद्वैत चिन्मात्र तत्त्व है स्वरूप से किसी को कुछ भी दुःख नहीं होता ।
हे मुनीश्वर ! जगत् और असत् जानकर अभावना करना और आत्मा