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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right;">८५</span>

है और कभी ऊपर को, वैसे ही जीव आशा के वश कभी पाताल और कभी आकाश को जाता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठेश्वरसंवादे चैतन्यो- न्मुखत्वविचारो नामैकोनत्रिंशत्तमसर्गः ॥ २९ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! स्वरूप के विस्मरण से जो इस प्रकार होता है कि मैं मारनेवाला हूँ, मैं दुखी हूँ, सो अनात्मा में अहं प्रतीति करके ही जीव दुःख का अनुभव करता है । जैसे स्वप्न में पुरुष अपने को पर्वत से गिरता देख दुखी होता है और अपने को मृतक देखता है, वैसे ही जीव स्वरूप के प्रमाद से अनात्मा में आत्म-अभिमान करके आपको दुखी देखता है । हे मुनीश्वर ! शुद्ध चैतन्यतत्त्व में जो चित्तभाव हुआ है, वही चित्तकला चेतने से जगत् का कारण हुआ है, परन्तु वास्तव में स्वरूप से भिन्न नहीं है । जैसे-जैसे चित्तकला चेतती गई है, वैसे ही वैसे जगत् होता गया है । वह चित्त का कारण भी नहीं हुआ और जब कारण ही नहीं हुआ, तब कार्य किसको कहिये ? हे मुनीश्वर ! न वह चित्त है, न चेतन है, न चेतनेवाला है, न द्रष्टा है, न दृश्य है और न दर्शन है; जैसे पत्थर में तेल नहीं होता । न कारण है, न कर्म है और न कारण इन्द्रियाँ हैं; जैसे चन्द्रमा में श्यामता नहीं होती । न वह मन है और न मानने योग्य दृश्य वस्तु है, जैसे आकाश में अंकुर नहीं होता । न वह अहंता है, न तम है और न दृश्य है; जैसे शंख को श्यामता नहीं होती । हे मुनीश्वर ! न वह विविध या अनेक है, न विविधता-रहित एक है; जैसे अणु में सुमेरु नहीं होता । न वह शब्द है, न स्पर्श का अर्थ है; जैसे मरुस्थल में बेल नहीं होती । न वस्तु है, न अवस्तु है; जैसे बरफ में उष्णता नहीं होती । न शून्य है, न अशून्य है, न जड़ है, न चेतन है; जैसे सूर्यमण्डल में अन्धकार नहीं होता । हे मुनीश्वर ! शब्द और अर्थ इत्यादि की कल्पना भी उसमें नहीं; जैसे अग्नि में शीतलता नहीं होती । वह तो केवल केवलीभाव अद्वैत चिन्मात्र तत्त्व है स्वरूप से किसी को कुछ भी दुःख नहीं होता ।

हे मुनीश्वर ! जगत् और असत् जानकर अभावना करना और आत्मा

८६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

को सत् जानकर भावना करना । इस भावना से सब अनर्थ निवृत्त हो जाते हैं । पर यह और किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती अपने आप ही प्राप्त होती है और अनादि ही सिद्ध है । जब उस आत्मा की ओर भावना होती है, तब सब भ्रम मिट जाते हैं और जब अनात्म भावना होती है, तब उसका पाना कठिन होता है । जो यत्न के साथ है सो यत्न बिना नहीं पाया जाता । आत्मा निर्विकल्प, अद्वैत और सबसे अतीत है, उसे अभ्यास बिना कैसे पा सकते हैं ? आत्मतत्त्व परम, एक स्वच्छ, तेज का भी प्रकाशक, सर्वगत, निर्मल, नित्य सदा उदित, शक्तिरूप, निर्विकार और निरञ्जन है । घट, पट, वट, वृक्ष, गादी, वानर, दैत्य, देवता, समुद्र, हाथी इत्यादि स्थावर-जङ्गमरूप जो कुछ जगत् है, सबका साक्षीरूप होकर आत्मतत्त्व स्थित है और दीपक की तरह सबको प्रकाशित करता है । आप सर्वक्रियातीत है, पर उसी से सब कार्य सिद्ध होते हैं । वह सर्वक्रियासंयुक्त भासित होता है और सर्वविकल्प से रहित जड़वत् भी भासित होता है । परन्तु वास्तव में परम चैतन्य है । आत्मतत्त्व सब चेतन का सार चेतन, निर्विकल्प और परमसूक्ष्म है और अपने आपमें किञ्चन ही भासित होता है । अपने ही प्रमाद से रूप, अवलोक और नमस्कार की त्रिपुटी भासित होती है; जब बोध होता है तब ज्यों का त्यों आत्मा भासित होता है । नित्य, शुद्ध, निर्मल और परमानन्दरूप के प्रमाद से चैतन्य चित्तभाव को प्राप्त होता है । जैसे साधु भी दुर्जन के संग से असाधु हो जाते हैं, वैसे ही अनात्मा के संग से यह नीचता को प्राप्त होता है । जैसे सोना दूसरी धातु के मेल से खोटा हो जाता है और जब शोधा जाता है, तब शुद्धता को प्राप्त होता है, वैसे ही अनात्मा के संग से यह जीव दुःखी होता है । जब अभ्यास और यत्न करके अपने शुद्ध रूप को पाता है, तब वही हो जाता है । जैसे मुख के श्वास से दर्पण मलिन हो जाता है तो उसमें मुख नहीं देख पड़ता, पर जब मलिनता मिट जाती है तब शुद्ध होता है और उसमें मुख स्पष्ट देख पड़ता है, वैसे ही चित्त संवेदन के प्रमाद से चेतने के कारण जगत्-भ्रम भासित होने लगता है और आत्म-

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८७

स्वरूप नहीं भासित होता । जब यह जगतसत्ता स्फुरण सहित दूर होगी, तब आत्मतत्त्व ज्ञात होगा और जगत् की असत्यता प्रतीत होगी ।

हे मुनीश्वर ! जब शुद्ध संवित् में चेतनता का चेतना निवृत्त होता है, तब जीव अहंताभाव को प्राप्त होता है और अहंकार को प्राप्त होने से अविनाशिरूप को विनाशी जानता है । हे मुनीश्वर ! स्वरूप से कुछ भी उत्थान होता है तो उससे स्वरूप से गिरकर कष्ट पाता है । जैसे पहाड़ से गिरी चीज नीचे चली जाती है और चूर्ण हो जाती है, वैसे ही जब जीव स्वरूप से उत्थान होता है और अनात्मा में अभि- मान और अहं प्रतीति होती है, तब जीव अनेक दुःखों को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! सब पदार्थों की सत्ता आत्मरूप में है । उसके अज्ञान से जीव द्वैतत्व को प्राप्त होता है । जब उसका बोध होगा, तब द्वैतभाव निवृत्त हो जायगा । वह आत्मा शुद्ध और चिन्मात्र स्वरूप है । उसी की सत्ता से देह-इन्द्रियादिक भी चेतन होते और अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं । जैसे सूर्य के प्रकाश से सब जगत् का व्यवहार होता है, प्रकाश के बिना कोई व्यवहार नहीं होता, वैसे ही आत्मा की सत्ता से देह, इन्द्रियादिक का व्यवहार होता है और वे अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं । हे मुनीश्वर ! जो नेत्र में मुख्य श्यामता है; वह अपने आपमें रूप को ग्रहण करती है । उसका बाहर के विषय से संयोग होता है और उस रूप का जिसमें अनुभव होता है, वही परम चैतन्यसत्ता है । त्वचा इन्द्रिय और स्पर्श का जब संयोग होता है, तब इन जड़ों का जिससे अनुभव होता है, वही साक्षीभूत परम चैतन्यसत्ता है । नासिका इन्द्रिय का जब गन्ध तन्मात्रा से संयोग होता है, तब उसके संयोग में जो अनुभवसत्ता है, वही परम चैतन्य है । इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इन पाँचों विषयों को श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना, नासिका, इन पाँचों इन्द्रियों से मिलकर जानने- वाला साक्षीभूत परम चैतन्य आत्मतत्त्व है । वह मुख्य संवित् परम चैतन्य कहलाता है, और जो बहिर्मुख चेतकर दृश्य से मिला है, वह

८८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

मलिन चित्त कहाता है। जब वही मलिनरूप अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होता है, तब शुद्ध होता है।

हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् आत्मस्वरूप है और शिलाघन की नाईं अद्वैत और सब विकारों से रहित है। इसका न उदय होता है और न अस्त। संकल्प के वश से जीवभाव को प्राप्त होता है और संकल्प के निवृत्त होने पर परमात्मारूप हो जाता है। हे मुनीश्वर ! आदि चित्तकला जीवरूपी रथ पर आरूढ़ है; जीव अहंकाररूपी रथ पर आरूढ़ है; अहंकार बुद्धिरूपी रथ पर आरूढ़ है; बुद्धि मनरूपी रथ पर आरूढ़ है; मन प्राणरूपी रथ पर चढ़ा है और प्राण इन्द्रियरूपी रथ पर चढ़े हैं। इन्द्रियों का रथ देह है और देह का रथ पदार्थ है। जो कर्म इन्द्रियाँ करती हैं, उसी के वश हो जरामरणरूपी संसार-पिंजड़े में भ्रमती हैं। इस प्रकार यह चक्र चलता है और उसमें प्रमाद करके जीव भटकता है। हे मुनीश्वर ! आत्मा का आभास यह चक्र विरूप है। जैसे स्वप्नपुर में जो नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं, वे वास्तव में कुछ नहीं हैं, वैसे ही यह जगत् वास्तव में कुछ नहीं है। जैसे मृगतृष्णा की नदी भ्रम से भासित होती है, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासित होता है। हे मुनीश्वर ! मन का रथ प्राण है। जब प्राणकला चेतना से रहित होती है, तब मन भी स्थिर हो जाता है और मन के स्थिर होने पर मन का मनन भी शान्त हो जाता है। जब प्राणकला चेतती है, तब मन का मनन भी चेतता है और जब प्राणकला स्थिर होती है, तब मनन निवृत्त हो जाता है। जैसे प्रकाश बिना पदार्थ नहीं दीखते और वायु के बिना धूल नहीं उड़ती, वैसे ही प्राण के स्फुरण से रहित मन शान्त हो जाता है। जैसे जहाँ पुष्प होते हैं वहाँ गन्ध होती है और जहाँ अग्नि है वहाँ उष्णता होती है, वैसे ही जहाँ प्राणस्पन्दन होता है, वहाँ मन भी होता है। हृदय में जो नाड़ी है, उसमें प्राण स्वतः चेतते हैं और उसी से मनन होता है। संवित् स्वच्छ रूप है। वह जड़-चेतन सर्वत्र भासती है और संवेदन प्राणकला में चेतती है।

हे मुनीश्वर ! आत्मसत्ता सर्वत्र अनुस्यूत होने पर भी जहाँ प्राण-

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८६

कला होती है, वहीं भासित होती है और जहाँ प्राणकला नहीं होती, वहाँ नहीं भासित होती । जैसे सूर्य का प्रकाश सब जगह होता है, परन्तु जहाँ उज्ज्वल स्थान, जल अथवा दर्पण होता है, वहीं प्रतिबिम्ब पड़ता है और जगह नहीं, वैसे ही आत्मसत्ता सर्वत्र है, परन्तु जहाँ प्राणकला पुर्यष्टका होती है वहीं भासित होती है, और जगह नहीं। जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब दिखता है, शिला में नहीं दिखता, वैसे ही पुर्यष्टका जो मनरूप है सो सबका कारण है और अहंकार, बुद्धि, इन्द्रियाँ उसी के भेद हैं, जो आप ही से कल्पित हैं, सब दृश्यजाल उसी से उदय होता है, और किसी वस्तु से नहीं। यह भली प्रकार अनुभव किया गया है । इससे मन ही देहादिक कर्मों में प्रवृत्त होता है, और सब वस्तुएँ उसी से भासित होती हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने मनप्राणोक्त-प्रतिपादनं नाम त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३० ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! आत्मसत्ता बिना जीव जड़वत् होता है और आत्मसत्ता से चेतन होकर चेष्टा करता है । जैसे चुम्बक पाषाण की सत्ता से जड़ लोहा चेष्टा करता है, वैसे ही सर्वगत आत्मा की सत्ता से जीव चेतता है और आत्मसत्ता भी जीवकला में भासती है, और जगह नहीं भासती । जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण ही में देख पड़ता है और जगह नहीं, वैसे ही परमात्मा सर्वगत और सर्वशक्तिमान् भी है परन्तु जीवकला ही में है। हे मुनीश्वर ! शुद्ध वास्तव स्वरूप से दृश्य की ओर जो इस जीवकला का उत्थान हुआ है, इससे वह चित्तभाव को प्राप्त हुआ है । जैसे शूद्र की संगति करके ब्राह्मण भी अपने को शूद्र मानने लगता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से जीवकला अपने को चित्त जानने लगी है । अज्ञान से घिरा हुआ जीव महादीन भाव को प्राप्त होता है, जड़देह के अभ्यास से कष्ट पाता है और काम, क्रोध, वात, पित्तादिक से जलता है । जैसी-जैसी भावना होती है, वैसा ही वैसा कर्म वह करता है और उन कर्मों की भावना में मिला भटकता

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$$\text{ॐ}$$ योगवाशिष्ठ $$\text{ॐ}$$

है । जैसे रथ पर आरूढ़ होकर रथी चलता है, वैसे ही जीवआत्मा मन, प्राण और कर्मों से चलता है ।

हे मुनीश्वर ! चैतन्य ही जड़ दृश्य जो अङ्गीकार करके जीवत्व को प्राप्त होता है; और मन प्राणरूपी रथ पर चढ़कर पदार्थ की भावना से नाना प्रकार के भेद को प्राप्त हुआ सा स्थित होता है । जैसे जल ही तरङ्गभाव को प्राप्त होता है, वैसे ही चैतन्य ही नाना प्रकार का होकर स्थित होता है। निदान यह जीवकला आत्मा की सत्ता को पाकर वृत्ति में स्फुरणरूप होती है । जैसे सूर्य की सत्ता को पाकर नेत्र रूप को ग्रहण करते हैं वैसे ही परमात्मा की सत्ता पाकर जीव वृत्ति में चेतता है और परमात्मा चित्त में स्थित हुआ स्फुरणरूप दीखता है; जैसे घर में दीपक होता है, तब प्रकाश होता है; दीपक बिना प्रकाश नहीं होता । अपने स्वरूप को भुलाकर जीव दृश्य की ओर लगा है, इसी कारण आधि-व्याधि से दुःखी होता है । जैसे जब कमल डंडी के साथ लगता है, तब उस पर भौंरे आकर बैठते हैं, वैसे ही जब जीव दृश्य की ओर लगता है तब दुःख होता है और उससे जीव दीन हो जाता है । जैसे जल तरङ्गभाव को प्राप्त होता है, वैसे ही जीव अपनी क्रिया से बंधन को प्राप्त होता है । जैसे बालक अपनी परछाहीं को देखकर आप ही अविचार से भय पाता है, वैसे ही अपने स्वरूप के प्रमाद से जीव आप ही दुःख पाता है और दीनता को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! चितशक्ति सर्वगत और स्वयं सिद्ध है । उसकी अभावना करके जीव दीनता को प्राप्त होता है । जैसे सूर्य बादल में घिर जाता है, वैसे ही मूढ़ता से आत्मा का आवरण होता है । पर जब प्राणों का अभ्यास करता है, तब जड़ता निवृत्त होती है और अपने आत्मरूप का स्मरण हो आता है । जिनकी वासना निर्मल हो चुकी है, वह स्थिर और एक रूप हो जाती है । वे जीव जीवन्मुक्त होकर चिरकाल तक जीते हैं और हृदयकमल में प्राणों को रोककर शान्ति को प्राप्त होते हैं। जब काष्ठ और मिट्टी के ढेले की तरह देह गिर पड़ती है, तब पुर्यष्टका आकाश में लीन हो जाती है । जैसे

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६१

आकाश में पवन लीन होता है, वैसे ही उनका मन पुर्यष्टका वहीं लीन हो जाती है।

हे मुनीश्वर ! जिनकी वासना शुद्ध नहीं हुई, उनकी पुर्यष्टका मृत्युकाल में आकाश में स्थित होती है और उसके अनन्तर फिर स्फुरित होती है। तब उस वासना के अनुसार जीव स्वर्ग-नरक को देखने लगता है। जब यह शरीर मन और प्राण से रहित होता है, तब शून्य-रूप हो जाता है। जैसे पुरुष घर को त्यागकर दूर चला जाय, वैसे ही मन और प्राण शरीर को त्यागकर और जगह चले जाते हैं और शरीर शून्य हो जाता है। हे मुनीश्वर ! चित्सत्ता सर्वत्र है, परन्तु जहाँ पुर्यष्टका होती है, वहीं भासित होती है और चेतन का अनुभव होता है; अन्यत्र नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जब यह जीव शरीर को त्यागता है, तब पञ्चतन्मात्रा को ग्रहण करके अपने संग ले जाता है, और जहाँ इसकी वासना होती है वहीं पहुँचता है। प्रथम इसका अन्तवाहक शरीर होता है, फिर दृश्य के दृढ़ अभ्यास से वह स्थूलभाव को प्राप्त हो जाता है और अन्तवाहकता भूल जाती है। जैसे स्वप्न में भ्रम से स्थूल आकार देखता है, वैसे ही जब मोह करके मरता है, तब अपने साथ स्थूल आकार देखता है। फिर स्थूल देह में अहं की प्रतीति करता है और उससे मिलकर कर्म करता है, तब असत्य को सत्य मानता है और सत्य को असत्य जानता है। इस प्रकार भ्रम को प्राप्त होता है। जब सर्वगत चिदंश से जीव अनरूप होता है, तब जगद्भाव को प्राप्त होता है। जब देह से पुर्यष्टका निकल जाती है, तब आकाश में जाकर लीन होती है। जब देह चेतना से रहित होती है, तब उसको मृतक कहते हैं और वह अपनी स्वरूपशक्ति को विस्मरण करके जर्जरीभाव को प्राप्त होती है। जब जीवशक्ति हृदयकमल में मूच्छित होती है और प्राण रोके जाते हैं, तब यह मृतक होता है। ऐसे ही बार-बार जन्म लेता और मरता है। हे मुनीश्वर ! जैसे वृक्ष में पत्ते लगते हैं काल पाकर नष्ट हो जाते हैं और फिर नवीन लगते हैं, वैसे ही यह जीव शरीर को धारण करता है और छोड़ता है; फिर शरीर ग्रहण करता है

६२ ☀️ योगवाशिष्ठ ☀️

और वह भी नष्ट हो जाता है। जो वृक्ष के पत्ते की तरह उपजते और नष्ट होते हैं, उनका शोक करना व्यर्थ है।

हे मुनीश्वर ! चैतन्यरूपी समुद्र में शरीररूपी अनेक तरङ्ग बुलबुले उपजते और नष्ट होते हैं। उनका शोक करना व्यर्थ है। जैसे दर्पण में जो अनेक पदार्थों का प्रतिबिम्ब पड़ता है; वह दर्पण से भिन्न नहीं होता, वैसे ही चैतन्य में अनेक पदार्थ भासित होते हैं। वह चैतन्य निर्मल आकाश की तरह विस्तीर्ण है। उसमें जो पदार्थ फुरते हैं, वे अनन्य रूप हैं और विधि-शरीर भी वही रूप है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देहपातविचारो नामैकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे अर्द्धचन्द्रधारी ! चैतन्यतत्त्व परमात्मा पुरुष तो अनन्त और एक रूप है, उसको यह द्वैत कहाँ से प्राप्त हुआ ? भूत और भविष्य काल कहाँ से दृढ़ हो रहे हैं ? एक में अनेकता कहाँ से प्राप्त हुई है ? बुद्धिमान दुःख को कैसे निवृत्त करते हैं और वह कैसे निवृत्त होता है ? ईश्वर बोले; हे ब्राह्मण ! ब्रह्मचैतन्य सर्वशक्तिमान् है। जब वह एक अद्वैत ही होता है, तब निर्मलता को प्राप्त होता है। एक के भाव से द्वैत कहाता है और द्वैत की अपेक्षा से एक कहाता है, पर ये दोनों कल्पनामात्र हैं। जब चित्त चेतता है, तब एक और दो की कल्पना होती है। चित्तस्पन्दन का अभाव होने पर दोनों की कल्पना मिट जाती है। कारण से जो कार्य भासित होता है, सो भी एक रूप है। जैसे बीज से लेकर फल पर्यन्त वृक्ष का जो विस्तार है, वह एक ही रूप है और बढ़ने-घटने की उसमें कल्पना होती है, वैसे ही चैतन्य में चित्त की कल्पना होती है। तब जगतरूप होकर भासता है, परन्तु उस काल में भी वही रूप है।

हे मुनीश्वर ! वृक्ष समेत बीज भी एक वस्तु है और कुछ नहीं; परन्तु जब बीज उगता है, तब वृक्ष के रूप में भासित होता है वैसे ही जब शुद्ध चैतन्य में चेतनकल्पना फुरती है, तब वह जगतरूप भासित होता है। हे मुनीश्वर ! कारण-कार्य विकाररूप जगत असम्यकदृष्टि में

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६३

भासित होता है। जैसे जल में तरङ्ग जो उठते हैं, वे जलरूप हैं-जल से भिन्न नहीं, जैसे खरगोश के सींग असत् हैं और जल में द्वैततरङ्ग कलना असत् है-अज्ञान से भासित होती है, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् भासित होता है। जैसे द्रवरूप से जल ही तरङ्गरूप हो भासता है, वैसे ही फुरने से आत्मतत्त्व जगतरूप हो भासता है। उसमें द्वैत नहीं है। चैतन्यरूपी बेल जो फैली है, उसमें पत्ते, फूल और फल एक ही रूप हैं। जैसे एक बेल अनेकरूप हो भासती है, वैसे ही एक चैतन्य अहं, त्वं, देश, काल आदिक विकार होकर भासित होता है। ये सब उसी का रूप हैं। हे मुनीश्वर ! जब सब ही एक चैतन्य है तब तुम्हारे प्रश्न के लिए अवसर कहाँ रहा ? देश, काल, क्रिया, नीति आदिक जो शक्ति-पदार्थ हैं, वे एक ही चिदात्मा है। जैसे जल में जब द्रवता होती है, तब वह तरङ्गरूप हो भासता है और उसका नाम तरङ्ग होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् जब फुरता है, तब अहं, त्वं आदिक नाना प्रकार के नाम होते हैं। पर वह ब्रह्म, शिव, परमात्मा, चैतन्यसत्ता, द्वैत, अद्वैत आदिक नामों से अतीत है; वाणी का विषय नहीं। ऐसा निर्विकल्प निर्विषय तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है। यह जगत् जो कुछ भासता है, वह भी वही चैतन्यतत्त्व है। जैसे बेल ही फूल और पत्ते होकर फैलती है, वैसे ही चैतन्य सर्वरूप होकर फैलता है।

हे मुनीश्वर ! महाचैतन्य में जब किंचन होता है, तब जीवरूप होकर स्थित होता है और फिर द्वैतकलना को देखता है। जैसे जीव स्वप्न में अपना स्वरूप त्यागकर परिच्छिन्न शरीर को धारण करता है और द्वैतरूप जगत् को देखता है, पर जब जागता है, तब अपने अद्वैतरूप को देखता है-परन्तु जागे बिना भी द्वैत कुछ नहीं हुआ, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी कुछ नहीं है, भ्रम से भासित होता है। जब यह जीव अपने वास्तव स्वरूप की ओर सावधान होता है, तब उसके अभ्यास से वही रूप हो जाता है। हे मुनीश्वर ! इस जीव का आदि शरीर आन्तवाहक है और संकल्प ही उसका रूप है। जब उसमें अहं भावना तीव्र होती है, तब वही आधिभौतिक होकर भासित होता है। जब उसमें सत्यता दृढ़ हो

६४ योगवासिष्ठ

जाती है तो उसकी भावना करके रागद्वेष से क्षुब्ध होता है, पर जब काकतालीय न्याय से अकस्मात् हृदय में विचार उपजता है तब संकल्प-रूपी आवरण दूर हो जाता है और जीव अपने वास्तव स्वरूप को प्राप्त होता है। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वेताल की कल्पना कर भय पाता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भय पाता है।

हे मुनीश्वर ! यह जो कुछ जगत भासित होता है, सो सब संकल्प-मात्र है। जैसा संकल्प हृदय में दृढ़ होता है, वैसा ही भासित होने लगता है। प्रत्यक्ष देखो कि जो पुरुष कुछ कार्य करता है तो कर्तृत्व-भाव उसके हृदय में दृढ़ होता है और कहता है कि यह कार्य मैं न करूँ। जब यही संकल्प दृढ़ होता है, तब यह उस कार्य का अपने को अकर्ता जानता है वैसे ही दृश्य की भावना से जगत् दृढ़ सत्य हो गया है। जब दृश्य का संकल्प निवृत्त होता है और जीव आत्मभावना में लगता है, तब जगत् का भ्रम निवृत्त हो जाता है और आत्मा ही देख पड़ता है। हे मुनीश्वर ! परमार्थ दृष्टि से द्वैत कुछ है ही नहीं, सब संकल्प की रचना है। संकल्प से रचा जो दृश्य है उसका संकल्प के अभाव से अभाव हो जाता है। मनोराज्य और गन्धर्व-नगर मन से रचित होता है, और संकल्प के अभाव से उसका अभाव हो जाता है। तब कुछ क्लेश नहीं रहता। हे मुनीश्वर ! जगत् संकल्प की तुष्टि से जीव दुःख का भागी होता है, जैसे स्वप्न में संकल्प करके जीव दुःखी होता है। इस संकल्पमात्र की इच्छा त्यागने में क्या कृपणता है ? जैसे स्वप्न में जो सुख भोगता है, वह सुख भी कुछ वस्तु नहीं, भ्रममात्र है, वैसे ही यह सुख भी भ्रममात्र है। हे मुनीश्वर ! संकल्प-विकल्प ने जीव को दीन किया है। जब वह संकल्प-विकल्प का त्याग करता है, तब चित्त अचित्त हो जाता है और ऊँचे पद में विराजमान होता है। जिस पुरुष ने विवेकरूपी वायु से संकल्परूपी मेघ को दूर किया है, वह परम निर्मल हो जाता है। जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही संकल्प-विकल्परूपी मल से रहित जीव उज्ज्वलभाव को प्राप्त होता है। संकल्प के त्याग में जो शेष रहता है, वह सत्तामात्र

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ६५

परमानन्द तुम्हारा स्वरूप है। हे मुनीश्वर! आत्मा सर्वशक्तिरूप है। जैसी भावना होती है, वैसा ही मनुष्य उसे अपनी भावना से देखता है। इस कारण सब संकल्पमात्र है; भ्रम से उदय हुआ है और संकल्प के लीन होने से सब लीन हो जाता है। हे मुनीश्वर! संकल्परूपी लकड़ी और तृष्णारूपी घृत से जन्मरूपी अग्नि को यह जीव बढ़ाता है और फिर उसका अन्त कदापि नहीं होता। जब असंकल्परूपी वायु और जल से इसको बुझावे, तब शान्त हो जाती है। जैसे दीपक का निर्वाण हो जाता है, वैसे ही जन्मरूपी अग्नि बुझ जाती है। जीव संकल्परूपी वायु से तृष्णा की नाईं भ्रमता है। हे मुनीश्वर! तृष्णारूपी कञ्ज की बेलि को जीव संकल्परूपी जल से सींचता है। जब असंकल्प-रूपी शोषण और विचाररूपी खड्ग से इसे काटे, तभी इसका अभाव होता है। जो अभावमात्र है, उसका आभास का क्षय होने पर अभाव हो जाता है। जैसे गन्धर्वनगर होता है, वैसे ही यह जगत् असम्यक् ज्ञान से भासित होता है और सम्यक्ज्ञान में लीन हो जाता है। जैसे कोई राजा स्वप्न में अपने को रङ्क देखे और पहले का स्वरूप भूलकर दीनता को प्राप्त हो, पर जब पहले का स्वरूप स्मरण आता है, तब अपने को राजा जानता है और दुःख मिट जाता है, वैसे ही जीव को जब अपना वास्तव पूर्व स्वरूप भूल जाता है, अपने को परिच्छिन्न, दीन और दुःखी जानता है, पर जब स्वरूप का ज्ञान होता है, तब सब दुःख मिट जाता है और जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही निर्मल हो जाता है। जैसे वर्षाकाल के मेघ न रहने पर आकाश निर्मल होता है, वैसे ही अज्ञानरूपी मल से रहित जीव निर्मल होकर शुद्धपद को प्राप्त होता है जो ऐसी युक्ति से भावना करता है कि मैं एक आत्मा और द्वैत से रहित हूँ, वह वही होता है और द्वैत का अभाव हो जाता है। तब उत्तमपद ब्रह्म देव पूज्य, पूजक और पूजा का भेद मिटकर किञ्चित् निष्किञ्चन की भाँति चित्त एकरूप हो जाता है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोदैवप्रतिपादन-
न्नामद्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३२ ॥

६६ ❇ योगवाशिष्ट ❇

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! वह देव निरन्तर स्थित है। वह द्वैत और एक पद से रहित है; द्वैत और संयुक्त एक भी वही है। संकल्प में मिल-कर चेतनरूप संसार को प्राप्त हुआ है। जो संकल्प के मल से रहित है, वह संसार से रहित है, 'मैं हूँ' इसी संकल्प से वन्धन होता है जब इस भाव से मुक्त होता है, तब सुख-दुःख का अभाव हो जाता है और शुद्ध निरञ्जन एकसत्ता सर्वात्मा आकाश सा व्यापक होता है। इसी का नाम मुक्ति है। ब्रह्म आकाश सा व्यापक है। वशिष्ठजी बोले, हे प्रभो ! जब मन में मन क्षीण होता है और इन्द्रियाँ मन में लीन होती हैं तब वह द्वितीय और तृतीयपद किसकी भाँति शेष रहता है ? जो महा सत्ता आत्मसत्ता सबको अपने में लीन करती है, वह किसकी तरह है ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जब मन मे मन को, जिसके अंग इन्द्रियाँ हैं, विचार करके वश में करता है, अथवा उपासना करके आत्म बोध प्राप्त करता है, तब द्वैत व एक की कल्पना नष्ट होती है और जगञ्जाल की सत्ता नष्ट हो जाती है। उसके पीछे जो शेष रहता है, वही आत्मतत्त्व प्रकाश पाता है। जैसे भुने बीज में अंकुर नहीं उप-जता, वैसे ही जब मन का उपशम होता है, तब उसमें जगत् की सत्ता का अभाव हो जाता है और चैतन्यसत्ता चित्तसत्ता को अपने में लीन कर लेती है। जब मनरूपी मेघ की सत्ता नष्ट होती है, तब शरत्काल के आकाश सी निर्मल आत्मसत्ता भासित होती है। जब चित्त की चञ्चलता मिट जाती है, तब परम निर्मल पावन चिन्मात्रतत्त्व प्राप्त होता है। एक और द्वैत तथा भाव-अभावरूप संसार की कल्पना मिट जाती है और सम सत्तारूप तत्त्व, जो सर्वव्यापक और संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, प्राप्त होता है। तब सुषुप्त की तरह निर्भय बोध हो जाता है और शान्तिरूप आत्मा को पाकर जीव शान्तरूप हो जाता है। हे मुनीश्वर ! मन की क्षीणता का यह प्रथमपद तुमसे कहा है। अब द्वितीयपद सुनो।

जब चित्तशक्ति मन के मनन से मुक्त होती है, तब चन्द्रमा के प्रकाश सा शीतल हो जाता है; आकाश सा विस्तृत अपना रूप

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☀️ योगवाशिष्ठ ☀️

होता, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। सम सत्ता शिव शान्ति रूप और अनिर्वचनीय है। इसकी चतुर्थमात्रा तुरीयपद परमशान्त है।

इतना कह वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज! इस प्रकार जब ईश्वर ने कहा और परम शान्तिरूप आत्मतत्त्व का प्रसङ्ग वशिष्ठजी ने सुना, तब दोनों की वृत्ति आत्मतत्त्व में स्थित हो गई और वे मौन हो गये, मानो चित्र लिखे हों। एक मुहूर्त पर्यन्त दोनों के चित्त की वृत्ति ऐसी ही रही। फिर ईश्वर जागे।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने परमेश्वरोपदेशो नाम त्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३३ ॥

वाल्मीकिजी बोले कि एक मुहूर्त उपरान्त सदाशिवजी ने तीनों नेत्र खोले तो जैसे पृथ्वीरूपी संपुट से सूर्य निकले वैसे ही उनके नेत्र निकले और जैसे द्वादश सूर्य का प्रकाश इकट्ठा हो, वैसे ही उनका प्रकाश हुआ। उन्होंने देखा कि वशिष्ठजी के नेत्र मूँदे हुए हैं। तब कहा कि हे मुनीश्वर! जागो, अब नेत्र क्यों मूँदे हो? जो कुछ देखना था सो तो तुमने देखा, अब समाधि लगाने का श्रम किस लिए करते हो? तुम सरीखे तत्त्ववेत्ताओं को कुछ हेय या उपादेय नहीं होता। तुम जैसे बुद्धिमान् हो, वैसे ही आत्मदर्शी भी। जो कुछ पाने योग्य था, सो तुमने पाया और जानने योग्य जाना। बालकों के बोध के निमित्त जो तुमने मुझसे पूछा था, सो मैंने कहा। अब तुम चुप क्यों हो?

हे राम! इस प्रकार कहकर सदाशिव ने मेरे भीतर प्रवेश करके चित्त की वृत्ति से जगाया और जब मैं जागा तब फिर ईश्वर ने कहा, हे वशिष्ठ! इस शरीर की क्रिया का कारण प्राणस्पन्दन है। प्राणों से ही शरीर की चेष्टा होती है। उसमें आत्मा उदासीन की तरह स्थित है। वह न कुछ करता है, न भोगता है। जब जीव को अपने स्वरूप का प्रमाद होता है, तब देह में अभिमान होता है और वह अपने को कर्त्ता और भोक्ता मानता है, इससे दुःख पाता और इस लोक-परलोक में भटकता है। जब आत्मविचार उपजता है, तब आत्मा का अभ्यास होता है; देहाभिमान मिट जाता है और दुःख से मुक्त होता है। शरीर-

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६६

के नष्ट होने पर आत्मा का नाश नहीं होता । शरीर चेतन होकर प्राणों से चेतता है; जब प्राण निकल जाते हैं, तब शरीर मूक जड़रूप हो जाता है । चलाने और पवित्र करनेवाली जो संवित्शक्ति है, वह आकाश से भी सूक्ष्म है । वह शरीर का नाश होने पर नष्ट नहीं होती और जब नाश नहीं होती तब नाश का भ्रम कैसे हो ? हे मुनीश्वर ! आत्मतत्त्व ब्रह्मसत्ता सर्वत्र है, परन्तु वहीं भासित होती है जहाँ सात्त्विक गुण का अंश मन और प्राण होते हैं । मन और प्राणों सहित देह भासित होती है । जैसे निर्मल दर्पण में जब मुख का प्रतिबिम्ब दिखता है और आदर्श मलिन होता है, तब मुख विद्यमान भी होता है, परन्तु नहीं भासित होता, वैसे ही मन और प्राण जब देह में होते हैं, तब आत्मा भासित होती है और जब मन और प्राण निकल जाते हैं तब मलिन शरीर में आत्मसत्ता नहीं भासित होती । हे मुनीश्वर ! आत्मसत्ता सब जगह पूर्ण है, परन्तु भासित नहीं होती । जब उसका अभ्यास होता है, तब सर्वात्मरूप होकर भासित होती है । वही सर्वकलना से रहित शुद्ध शिवरूप सबकी सत्तरूप है । विष्णु, शिव, ब्रह्मा, देवता, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, सूर्यादिक सब जगत् का आदि-शरीर वही है । वह एक देव शुद्ध चैतन्यरूप सब देवों का देव है । सब उसके दास और उसके चित्त का उल्लास हैं ।

हे मुनीश्वर ! इस जगत् में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र जो बड़े देवता हैं, वे उसी तत्त्व से प्रकट हुए हैं । जैसे अग्नि से चिनगारी उपजती है और समुद्र से तरङ्गं प्रकट होती हैं, वैसे ही हम उससे प्रकट हुए हैं । यह अविद्या भी उसी से प्रकट है और अनेक शाखाएँ उसकी हुई हैं । देव, अदेव, वेद और वेद के अर्थ और जीव सब उस अविद्या की जटा है । ये अनन्त हैं, फिर-फिर उपजती और मिटती हैं । देश, काल, पृथिवी आदिक भी सब उसी से उत्पन्न हैं । वही सर्वसत्तारूप आत्मदेव है । हम ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र का परमपिता आत्मा ही है । सबका मूल बीज वही देव है, सब उससे उपजे हैं । जैसे वृक्ष से पत्ते उपजते हैं, वैसे ही सब उसी महादेव से उपजते हैं । सबका अनुभवकर्ता, सबको सत्ता देनेवाला

१०० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

और सब प्रकाशों में प्रकाशक वही है। वह तत्त्ववेत्ताओं का पूज्य है, सबमें प्रत्यक्ष है और सर्वदा सब प्रकार सबमें उदित आकार चैतन्य अनुभवरूप है। उसके आवाहन में मन्त्र, आसन आदि सामग्री न चाहिए, क्योंकि वह सर्वदा अनुभवरूप से प्रत्यक्ष है और सब प्रकार सब जगह विद्यमान है। जहाँ-जहाँ उसके पाने का यत्न करिये, वहाँ-वहाँ पहले से ही विद्यमान है। वह शिवतत्त्व आदि से ही सिद्ध है और मन वाणी में तीनों रूपों में वही भासित होता है। वह सबका आदि पूज्य, नमस्कार करने और जानने योग्य है। हे मुनीश्वर ! जरा, मृत्यु, शोक और भय को मिटानेवाला ऐसा जो आत्मतत्त्व है, उसको जीव आपसे आप ही देखता है और उसका साक्षात्कार होने पर चित्त भुने बीज की नाईं हो जाता है, फिर उसमें कोई कर्मवासना नहीं उगती। वह शिवतत्त्व जीव का भी बीज है। सब पदों का पद वही है। अनुभवरूप आत्मा ही परम-पद है। भिन्नदृष्टि का त्याग करो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देवनिर्णयो नाम चतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३४ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! वह चितरूप तत्त्व सबके भीतर स्थित है। अनुभवरूप शुद्ध देव ईश्वर और सब बीजों का बीज वही है। सब सारों का सार, कर्मों का कर्म और धर्मों का धर्म, चैतन्यतत्त्व, निर्मल-रूप, सब कारणों का कारण और आप अपना कारण वही है। वह सब भाव और अभाव का प्रकाशक और परम प्रकाशरूप सब चेतनों की चैतन्यसत्ता है। वह भौतिक प्रकाश से रहित अलौकिक प्रकाश सब जीवों का जीव है। चैतन्य घन निर्मल आत्मा अस्ति-तन्मयरूप, सत्-असत् से रहित महामतरूप है। सब सत्ताओं की सत्ता वही है। वही चिन्मात्रतत्त्व नानारूप हो रहा है। जैसे एक ही आत्मसत्ता स्वप्न में आकाश, स्कन्ध, पहाड़ आदि होकर भासित होती है। वैसे ही नाना रङ्ग-रूप से वही भासित होता है। जैसे सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी अनेक कोटि किरणों से अनेक तरङ्ग संयुक्त जान पड़ती है, वैसे ही यह जगत् उसमें भासित होता है।

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १०१

हे मुनीश्वर ! उसी आत्मतत्त्व का आभास यह प्रकाश है, उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे अग्नि से उष्णता भिन्न नहीं—वही है, वैसे ही आत्मा से जगत् भिन्न नहीं, वही है। सुमेरु भी उसके आगे परमाणुरूप है। सम्पूर्ण काल उसका एक निमेषरूप है। कल्प भी उसकी पलकों के निमेष और उन्मेष की तरह उदय और लय होते हैं। सप्त-समुद्र-संयुक्त पृथ्वी उसके रोम के अग्र भाग की तरह तुच्छ है। ऐसा वह देव है। वह संसार की रचना नहीं करता और कर्तृत्व को प्राप्त होता है। बड़े कर्मों को करता प्रतीत होता है, तो भी कुछ नहीं करता। द्रव्यरूप देख पड़ता है तो भी द्रव्य से रहित है। निर्द्रव्य होकर भी द्रव्यवान् है। देह-धारी नहीं, तो भी देहधारी है और बड़ा देहधारी होकर भी अदेह है। सबकी सत्तारूप वही देव है। ठंढी, भोलि, घले, मत्तचुल, पिंडली, माँगले, वेल, बिलिमिला, लोबलाग, युगल, सभम इत्यादि वाक्य निरर्थक हैं, इनका अर्थ कुछ नहीं, तो भी उस देव से सिद्ध होते हैं। ऐसा कुछ नहीं, जो उस देव में असत् नहीं, और ऐसा भी कुछ नहीं, जो उस देव से सत् नहीं। हे मुनीश्वर ! जिससे यह सब है, जो यह सब है और सबमें नित्य है, उस सर्वात्मा को मेरा नमस्कार है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महेश्वरवर्णनन्नाम पञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३५ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! शब्द की सत्ता वही है। सर्वसत्ता रत्नों का संपुट वही है। वही तत्त्व चमत्कार करके प्रकट होता है। जैसे जल ही तरङ्ग, फेन बुलबुले आदि के आकार में देख पड़ता है, वैसे ही वह देव नाना प्रकार के आकार रखकर प्रकट होता है। वही फल और गुच्छे के रूप में स्थित होता है और वही उनमें सुगन्ध है। घ्राण इन्द्रिय में स्थित होकर आप ही उसे सूँघता है। आप ही त्वचा इन्द्रिय होता है। आप ही पवन होकर चलता है। आप ही ग्रहण करता है। आप ही जलरूप होता है। आप ही वायु होकर सुखाता है। आप ही श्रवणेन्द्रिय और आप ही शब्द होकर ग्रहण करता है। इसी प्रकार जिह्वा, त्वचा, नासिका कर्ण और नेत्र होकर आप ही स्पर्श, रूप, रस,

१०९ 卐 योगवासिष्ठ 卐

गन्ध और शब्द को ग्रहण करता है। उसी ने सब पदार्थ रचे हैं। उसी ने नीति रची है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, शिव और पञ्चम ईश्वर सदाशिव तक वही देव इस प्रकार हुआ है। आप ही साक्षी की तरह स्थित होता है। जैसे दीपक के प्रकाश से मन्दिर की सब क्रियाएँ होती हैं, वैसे ही संसाररूपी मण्डप की सब क्रियाएँ उसी साक्षी से होती हैं। उसमें उसकी शक्ति नृत्य करती है और वह आप साक्षिरूप होकर देखता है।

वशिष्ठजी बोले कि फिर मैंने पूछा, हे जगत् के नाथ ! शिव की शक्ति क्या है, कैसे स्थित है ? देव को साक्षात् कैसे करते हैं और उसका नृत्य कैसे होता है ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! आत्मतत्त्व स्वभाव से अचल और शान्तरूप है। शिव परमात्मा निर्मल चिन्मात्ररूप और निराकार है। उसकी शक्ति इच्छा और काल, नीति, मोह, ज्ञान, क्रिया कर्तृत्व आदि शक्तियाँ हैं। उन शक्तियों का अन्त नहीं। वह अनन्त रूप चिन्मात्रदेव है। यह जो मैंने तुमसे शक्ति कही, वह भी शिवरूप है, भिन्न नहीं। शिव और शक्ति एकरूप हैं, और बहुत भासित होते हैं। जैसे पदार्थों में अर्थ-शक्ति और आत्मा में साक्षी-शक्ति कल्पित है, वैसे ही कालशक्ति नर्तक की नाईं ब्रह्माण्डरूपी नृत्यमण्डल में नृत्य करती है। क्रिया-शक्ति भी कर्तृत्व से नृत्य करती है। वही शक्ति कहलाती है। जैसे आदि नीति हुई है, ब्रह्मा से लेकर तृण तक वैसे ही स्थित है—अन्यथा नहीं होती। हे मुनीश्वर ! यह सम्पूर्ण जगत् नृत्य करता है। संसाररूपी नाटिनी की प्रेरणा करनेवाली नीति है और परमेश्वर परमात्मा साक्षिरूप है। वह सदा उदित प्रकाशरूप और एकरस स्थित है। नीति आदिक शक्तियाँ भी उससे भिन्न नहीं। वे उसी का रूप हैं—इससे सब कुछ देव ही जानो, द्वैत नहीं।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने नीति-नृत्यवर्णनन्नाम षट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! उसी एक देव परमात्मा की साधु-सन्त-भक्त-पूजा करते हैं। वह चिन्मात्र अनुभव आत्मा घटपटादिक सबसे स्थित है, ब्रह्मा, इन्द्रादिक देवता और जीव, सबके भीतर-बाहर भी

  • निर्वाण प्रकरण * १०३

वही स्थित है। उस सर्वात्मा शान्तरूप देव का पूजन दो प्रकार से होता है। उस इष्टदेव का पूजन ध्यान है, और ध्यान ही पूजन है। जहाँ-जहाँ मन जाय, वहाँ-वहाँ लक्ष्यरूप आत्मा का ध्यान करे। सबका प्रकाशक आत्मा ही है। वह चिद्रूप अनुभव से हृदय के भीतर स्थित और अहंता में सिद्ध है। वही सबका सार और सबका आश्रयरूप है। उसका जो विराट्-रूप है, अब सुनो। वह अनन्त है। परमाकाश उसकी ग्रीवा है। अनेक पाताल उसके चरण हैं। अनेक दिशाएँ उसकी भुजा हैं। सब प्रकाश उसके शास्त्र हैं। हृदयकोश कोण में स्थित है। ब्रह्माण्ड समूह को परंपरा में वह प्रकाशित करता है। परमाकाश अपाररूप है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादि देवता और जीव उसकी रोमावली है। त्रिलोकी में जो देहरूपी यन्त्र हैं, उनमें इच्छादिक शक्तिरूप सूत्र व्याप्त है, जिसमें सब चेष्टा करते हैं। वह देव एक भी है और अनन्त भी। सत्तामात्र उसका स्वरूप है, सब जगज्जाल उसका विवर्त है, काल उसका द्वारपाल है और पर्वतादिक ब्रह्माण्ड जगत् उसकी देह के किसी कोण में स्थित है। उस देव का चिन्तन करो। उसके सहस्र चरण, सहस्र नेत्र, शीश, भुजा और भुजाओं के विभूषण हैं। सर्वत्र उसकी नासिका इन्द्रिय है, सर्वत्र रसना इन्द्रिय है, सर्वत्र त्वचा इन्द्रिय है, सब ओर मन है, पर वह सब मननकला से अतीत है। सब ओर वही शिवरूप सर्वदा और सबका कर्त्ता है, सब संकल्पों के अर्थ का फलदायक है और सर्वभूत के भीतर स्थित और सब साधनों को सिद्ध करता है। ऐसा देव सबमें सब प्रकार और सर्वदा स्थित है। उसी देव का चिन्तन करो और उसी देव के ध्यान में सावधान रहो। सदा उसी के आश्रय रहना उस देव का बाहरी पूजन है। अब भीतर का पूजन सुनो।

हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! संवित्मात्र जो देव है, वह सदा अनुभव में प्रकाशित होता है। उसका पूजन दीपक से नहीं होता; न धूप, पुष्प, चंदन-लेप और केसर से होता है। अर्घ्य, पाद्यादिक पूजा की सामग्रियों से भी उस देव का पूजन नहीं होता। उसका पूजन तो अनायास नित्य ही होता है। हे मुनीश्वर! एक अमृतरूपी जो बोध है, उससे उस देव

१०४ योगवाशिष्ठ

का सजातीय प्रत्यय ध्यान करना ही उसका परम पूजन है । हे मुनीश्वर ! शुद्ध चिन्मात्र देव अनुभवरूप है । उसका सर्वदा और सब प्रकार पूजन करो; अर्थात् देखना, स्पर्श करना, सूँघना, सुनना, बोलना, देना, लेना, चलना, बैठना इत्यादि जो कुछ क्रियाएँ हैं, सब चैतन्य साक्षी में अर्पण करो और उसी के परायण बनो । इस प्रकार आत्मदेव का पूजन करो । हे मुनीश्वर ! आत्मदेव का ध्यान करना ही धूप-दीप है और पूजन की सब सामग्री यही है । ध्यान ही उस देव को प्रसन्न करता है और उससे परमानन्द प्राप्त होता है । और किसी प्रकार से वह देव नहीं प्राप्त होता । हे मुनीश्वर, मूढ़ भी इस प्रकार ध्यान से उस ईश्वर की पूजा करे तो त्रयोदश निमेष में जगत्-दान के फल को पाता है । सत्रह निमेष के ध्यान से प्रभु को पूजे तो अश्वमेधयज्ञ के फल को पाता है । और केवल ध्यान से आत्मा का एक घड़ी पर्यन्त पूजन करे तो राजसूययज्ञ के फल को पाता है । जो दो प्रहर पर्यन्त ध्यान करे तो लक्ष राजसूययज्ञ के फल को पाता है और जो दिन भर ध्यान करे तो असंख्य अमित फल पाता है । हे मुनीश्वर ! यह परम योग है यही परम क्रिया है और यही परम प्रयोजन है । हे मुनीश्वर ! दोनों पूजाएँ मैंने तुमसे कहीं । जो यह परमपूजा करता है, वह परमपद को पाता है । उसको सब देवता नमस्कार करते हैं और वह पुरुष सबका पूजनीय होता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने अन्तर्बाह्य-
पूजावर्णनंनाम सप्तत्रिंशत्तमसर्गः ॥ ३७ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! अब तुम अभ्यन्तर का पूजन सुनो । वह सर्वत्र पवित्र करनेवाले को भी पवित्र करता है और सब तम और अज्ञान का नाश करता है । मैं वह आत्मपूजन तुमसे कहता हूँ, जो सब प्रकार से सर्वदा होता है और व्यवधान कभी नहीं पड़ता; चलते, बैठते, जागते, सोते सब व्यवहारों में नित्य ध्यान में रहता है। हे मुनीश्वर ! इस संसार में संवितरूप चिन्मात्र नित्य स्थित है । उसका पूजन करो । जो सब प्रत्ययों का कर्त्ता और सदा अनुभव मे प्रकाशित

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १०५

होता है, उसका अपने में आप पूजन करो। उठते, चलते, खाते, पीते जो कुछ बाहर के लिए त्याग, ग्रहण और भोग हैं, सबको करते रहते भी उस देव की पूजा करो। हे मुनीश्वर! शरीर में शिवलिङ्ग चिह्न से रहित बोधरूप देव है। यथाप्राप्त में सम रहना उस देव का पूजन है। यथाप्राप्ति के समभाव में स्नान करके शुद्ध होकर बोधरूप लिङ्ग का पूजन करो। जो कुछ प्राप्त हो, उसमें रागद्वेष से रहित होना और सर्वदा साक्षीरूप अनुभव में स्थित रहना ही उसका पूजन है। हे मुनीश्वर! सूर्य के भुवन आकाश में वही सूर्य होकर प्रकाश करता है और चन्द्रमा के भुवन में चन्द्रमा होकर स्थित होता है। इनसे लेकर और भी जो पदार्थ समूह हैं, उनमें जैसी-जैसी भावना से स्फुरण हुआ है, वही रूप होकर वह देव स्थित है। हे मुनीश्वर! जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप और अद्वैत है, उसको देखना और किसी में वृत्ति न लगाना ही उस देव का पूजन है। प्राण अपानरूपी रथ पर आरूढ़ जो हृदय में स्थित है, उसका ज्ञान ही पूजन है। वही सब कर्म करता है। सब भोगों का भोक्ता, सब शब्दों को श्रवण करनेवाला, भागवतरूप और सबकी भावना करनेवाला वही परम प्रकाशरूप है। ऐसा जो संवित्तत्त्व है, उसको सर्वज्ञ जानकर उसका चिन्तन करना ही उसका पूजन है।

वह देव सब देहों में स्थित है तो भी आकाश सा निर्लिप्त निर्मल है। वह जाता भी है और नहीं जाता। प्राणरूपी आलय में प्रकाशित है; हृदय, कण्ठ, तालु, जिह्वा, नासिका और पीठ में व्यापक है, शब्द आदि विषयों को करता और मन का प्रेरक है। जैसे तिल के आश्रय तेल है, वैसे ही आत्मा सबका आश्रय है। वह कलनारूपी कलङ्क से रहित और कल्पनाओं से संयुक्त भी है। सम्पूर्ण देहों में वही एक देव व्याप रहा है। हृदय में जो प्रत्यक्ष होता है, वही निर्मल चिन्मात्र प्रकाशरूप और कलनारूपी कलङ्क से रहित सदा प्रत्यक्ष है और अपने में आप ही उसका अनुभव किया जाता है। सर्वदा सब पदार्थों का प्रकाशक, प्रत्यक चैतन्य जो आत्मतत्त्व अपने हृदय में स्थित है, वही अपने फुरने से शीघ्र ही द्वैत की तरह हो जाता है। हे मुनीश्वर! जो