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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 904, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 904

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६३

भासित होता है। जैसे जल में तरङ्ग जो उठते हैं, वे जलरूप हैं-जल से भिन्न नहीं, जैसे खरगोश के सींग असत् हैं और जल में द्वैततरङ्ग कलना असत् है-अज्ञान से भासित होती है, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् भासित होता है। जैसे द्रवरूप से जल ही तरङ्गरूप हो भासता है, वैसे ही फुरने से आत्मतत्त्व जगतरूप हो भासता है। उसमें द्वैत नहीं है। चैतन्यरूपी बेल जो फैली है, उसमें पत्ते, फूल और फल एक ही रूप हैं। जैसे एक बेल अनेकरूप हो भासती है, वैसे ही एक चैतन्य अहं, त्वं, देश, काल आदिक विकार होकर भासित होता है। ये सब उसी का रूप हैं। हे मुनीश्वर ! जब सब ही एक चैतन्य है तब तुम्हारे प्रश्न के लिए अवसर कहाँ रहा ? देश, काल, क्रिया, नीति आदिक जो शक्ति-पदार्थ हैं, वे एक ही चिदात्मा है। जैसे जल में जब द्रवता होती है, तब वह तरङ्गरूप हो भासता है और उसका नाम तरङ्ग होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् जब फुरता है, तब अहं, त्वं आदिक नाना प्रकार के नाम होते हैं। पर वह ब्रह्म, शिव, परमात्मा, चैतन्यसत्ता, द्वैत, अद्वैत आदिक नामों से अतीत है; वाणी का विषय नहीं। ऐसा निर्विकल्प निर्विषय तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है। यह जगत् जो कुछ भासता है, वह भी वही चैतन्यतत्त्व है। जैसे बेल ही फूल और पत्ते होकर फैलती है, वैसे ही चैतन्य सर्वरूप होकर फैलता है।

हे मुनीश्वर ! महाचैतन्य में जब किंचन होता है, तब जीवरूप होकर स्थित होता है और फिर द्वैतकलना को देखता है। जैसे जीव स्वप्न में अपना स्वरूप त्यागकर परिच्छिन्न शरीर को धारण करता है और द्वैतरूप जगत् को देखता है, पर जब जागता है, तब अपने अद्वैतरूप को देखता है-परन्तु जागे बिना भी द्वैत कुछ नहीं हुआ, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी कुछ नहीं है, भ्रम से भासित होता है। जब यह जीव अपने वास्तव स्वरूप की ओर सावधान होता है, तब उसके अभ्यास से वही रूप हो जाता है। हे मुनीश्वर ! इस जीव का आदि शरीर आन्तवाहक है और संकल्प ही उसका रूप है। जब उसमें अहं भावना तीव्र होती है, तब वही आधिभौतिक होकर भासित होता है। जब उसमें सत्यता दृढ़ हो