योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ ☀️ योगवाशिष्ठ ☀️
और वह भी नष्ट हो जाता है। जो वृक्ष के पत्ते की तरह उपजते और नष्ट होते हैं, उनका शोक करना व्यर्थ है।
हे मुनीश्वर ! चैतन्यरूपी समुद्र में शरीररूपी अनेक तरङ्ग बुलबुले उपजते और नष्ट होते हैं। उनका शोक करना व्यर्थ है। जैसे दर्पण में जो अनेक पदार्थों का प्रतिबिम्ब पड़ता है; वह दर्पण से भिन्न नहीं होता, वैसे ही चैतन्य में अनेक पदार्थ भासित होते हैं। वह चैतन्य निर्मल आकाश की तरह विस्तीर्ण है। उसमें जो पदार्थ फुरते हैं, वे अनन्य रूप हैं और विधि-शरीर भी वही रूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देहपातविचारो नामैकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे अर्द्धचन्द्रधारी ! चैतन्यतत्त्व परमात्मा पुरुष तो अनन्त और एक रूप है, उसको यह द्वैत कहाँ से प्राप्त हुआ ? भूत और भविष्य काल कहाँ से दृढ़ हो रहे हैं ? एक में अनेकता कहाँ से प्राप्त हुई है ? बुद्धिमान दुःख को कैसे निवृत्त करते हैं और वह कैसे निवृत्त होता है ? ईश्वर बोले; हे ब्राह्मण ! ब्रह्मचैतन्य सर्वशक्तिमान् है। जब वह एक अद्वैत ही होता है, तब निर्मलता को प्राप्त होता है। एक के भाव से द्वैत कहाता है और द्वैत की अपेक्षा से एक कहाता है, पर ये दोनों कल्पनामात्र हैं। जब चित्त चेतता है, तब एक और दो की कल्पना होती है। चित्तस्पन्दन का अभाव होने पर दोनों की कल्पना मिट जाती है। कारण से जो कार्य भासित होता है, सो भी एक रूप है। जैसे बीज से लेकर फल पर्यन्त वृक्ष का जो विस्तार है, वह एक ही रूप है और बढ़ने-घटने की उसमें कल्पना होती है, वैसे ही चैतन्य में चित्त की कल्पना होती है। तब जगतरूप होकर भासता है, परन्तु उस काल में भी वही रूप है।
हे मुनीश्वर ! वृक्ष समेत बीज भी एक वस्तु है और कुछ नहीं; परन्तु जब बीज उगता है, तब वृक्ष के रूप में भासित होता है वैसे ही जब शुद्ध चैतन्य में चेतनकल्पना फुरती है, तब वह जगतरूप भासित होता है। हे मुनीश्वर ! कारण-कार्य विकाररूप जगत असम्यकदृष्टि में