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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 902, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 902

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६१

आकाश में पवन लीन होता है, वैसे ही उनका मन पुर्यष्टका वहीं लीन हो जाती है।

हे मुनीश्वर ! जिनकी वासना शुद्ध नहीं हुई, उनकी पुर्यष्टका मृत्युकाल में आकाश में स्थित होती है और उसके अनन्तर फिर स्फुरित होती है। तब उस वासना के अनुसार जीव स्वर्ग-नरक को देखने लगता है। जब यह शरीर मन और प्राण से रहित होता है, तब शून्य-रूप हो जाता है। जैसे पुरुष घर को त्यागकर दूर चला जाय, वैसे ही मन और प्राण शरीर को त्यागकर और जगह चले जाते हैं और शरीर शून्य हो जाता है। हे मुनीश्वर ! चित्सत्ता सर्वत्र है, परन्तु जहाँ पुर्यष्टका होती है, वहीं भासित होती है और चेतन का अनुभव होता है; अन्यत्र नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जब यह जीव शरीर को त्यागता है, तब पञ्चतन्मात्रा को ग्रहण करके अपने संग ले जाता है, और जहाँ इसकी वासना होती है वहीं पहुँचता है। प्रथम इसका अन्तवाहक शरीर होता है, फिर दृश्य के दृढ़ अभ्यास से वह स्थूलभाव को प्राप्त हो जाता है और अन्तवाहकता भूल जाती है। जैसे स्वप्न में भ्रम से स्थूल आकार देखता है, वैसे ही जब मोह करके मरता है, तब अपने साथ स्थूल आकार देखता है। फिर स्थूल देह में अहं की प्रतीति करता है और उससे मिलकर कर्म करता है, तब असत्य को सत्य मानता है और सत्य को असत्य जानता है। इस प्रकार भ्रम को प्राप्त होता है। जब सर्वगत चिदंश से जीव अनरूप होता है, तब जगद्भाव को प्राप्त होता है। जब देह से पुर्यष्टका निकल जाती है, तब आकाश में जाकर लीन होती है। जब देह चेतना से रहित होती है, तब उसको मृतक कहते हैं और वह अपनी स्वरूपशक्ति को विस्मरण करके जर्जरीभाव को प्राप्त होती है। जब जीवशक्ति हृदयकमल में मूच्छित होती है और प्राण रोके जाते हैं, तब यह मृतक होता है। ऐसे ही बार-बार जन्म लेता और मरता है। हे मुनीश्वर ! जैसे वृक्ष में पत्ते लगते हैं काल पाकर नष्ट हो जाते हैं और फिर नवीन लगते हैं, वैसे ही यह जीव शरीर को धारण करता है और छोड़ता है; फिर शरीर ग्रहण करता है