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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 901, कुल 1734 में से

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$$\text{ॐ}$$ योगवाशिष्ठ $$\text{ॐ}$$

है । जैसे रथ पर आरूढ़ होकर रथी चलता है, वैसे ही जीवआत्मा मन, प्राण और कर्मों से चलता है ।

हे मुनीश्वर ! चैतन्य ही जड़ दृश्य जो अङ्गीकार करके जीवत्व को प्राप्त होता है; और मन प्राणरूपी रथ पर चढ़कर पदार्थ की भावना से नाना प्रकार के भेद को प्राप्त हुआ सा स्थित होता है । जैसे जल ही तरङ्गभाव को प्राप्त होता है, वैसे ही चैतन्य ही नाना प्रकार का होकर स्थित होता है। निदान यह जीवकला आत्मा की सत्ता को पाकर वृत्ति में स्फुरणरूप होती है । जैसे सूर्य की सत्ता को पाकर नेत्र रूप को ग्रहण करते हैं वैसे ही परमात्मा की सत्ता पाकर जीव वृत्ति में चेतता है और परमात्मा चित्त में स्थित हुआ स्फुरणरूप दीखता है; जैसे घर में दीपक होता है, तब प्रकाश होता है; दीपक बिना प्रकाश नहीं होता । अपने स्वरूप को भुलाकर जीव दृश्य की ओर लगा है, इसी कारण आधि-व्याधि से दुःखी होता है । जैसे जब कमल डंडी के साथ लगता है, तब उस पर भौंरे आकर बैठते हैं, वैसे ही जब जीव दृश्य की ओर लगता है तब दुःख होता है और उससे जीव दीन हो जाता है । जैसे जल तरङ्गभाव को प्राप्त होता है, वैसे ही जीव अपनी क्रिया से बंधन को प्राप्त होता है । जैसे बालक अपनी परछाहीं को देखकर आप ही अविचार से भय पाता है, वैसे ही अपने स्वरूप के प्रमाद से जीव आप ही दुःख पाता है और दीनता को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! चितशक्ति सर्वगत और स्वयं सिद्ध है । उसकी अभावना करके जीव दीनता को प्राप्त होता है । जैसे सूर्य बादल में घिर जाता है, वैसे ही मूढ़ता से आत्मा का आवरण होता है । पर जब प्राणों का अभ्यास करता है, तब जड़ता निवृत्त होती है और अपने आत्मरूप का स्मरण हो आता है । जिनकी वासना निर्मल हो चुकी है, वह स्थिर और एक रूप हो जाती है । वे जीव जीवन्मुक्त होकर चिरकाल तक जीते हैं और हृदयकमल में प्राणों को रोककर शान्ति को प्राप्त होते हैं। जब काष्ठ और मिट्टी के ढेले की तरह देह गिर पड़ती है, तब पुर्यष्टका आकाश में लीन हो जाती है । जैसे