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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 900, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 900

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८६

कला होती है, वहीं भासित होती है और जहाँ प्राणकला नहीं होती, वहाँ नहीं भासित होती । जैसे सूर्य का प्रकाश सब जगह होता है, परन्तु जहाँ उज्ज्वल स्थान, जल अथवा दर्पण होता है, वहीं प्रतिबिम्ब पड़ता है और जगह नहीं, वैसे ही आत्मसत्ता सर्वत्र है, परन्तु जहाँ प्राणकला पुर्यष्टका होती है वहीं भासित होती है, और जगह नहीं। जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब दिखता है, शिला में नहीं दिखता, वैसे ही पुर्यष्टका जो मनरूप है सो सबका कारण है और अहंकार, बुद्धि, इन्द्रियाँ उसी के भेद हैं, जो आप ही से कल्पित हैं, सब दृश्यजाल उसी से उदय होता है, और किसी वस्तु से नहीं। यह भली प्रकार अनुभव किया गया है । इससे मन ही देहादिक कर्मों में प्रवृत्त होता है, और सब वस्तुएँ उसी से भासित होती हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने मनप्राणोक्त-प्रतिपादनं नाम त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३० ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! आत्मसत्ता बिना जीव जड़वत् होता है और आत्मसत्ता से चेतन होकर चेष्टा करता है । जैसे चुम्बक पाषाण की सत्ता से जड़ लोहा चेष्टा करता है, वैसे ही सर्वगत आत्मा की सत्ता से जीव चेतता है और आत्मसत्ता भी जीवकला में भासती है, और जगह नहीं भासती । जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण ही में देख पड़ता है और जगह नहीं, वैसे ही परमात्मा सर्वगत और सर्वशक्तिमान् भी है परन्तु जीवकला ही में है। हे मुनीश्वर ! शुद्ध वास्तव स्वरूप से दृश्य की ओर जो इस जीवकला का उत्थान हुआ है, इससे वह चित्तभाव को प्राप्त हुआ है । जैसे शूद्र की संगति करके ब्राह्मण भी अपने को शूद्र मानने लगता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से जीवकला अपने को चित्त जानने लगी है । अज्ञान से घिरा हुआ जीव महादीन भाव को प्राप्त होता है, जड़देह के अभ्यास से कष्ट पाता है और काम, क्रोध, वात, पित्तादिक से जलता है । जैसी-जैसी भावना होती है, वैसा ही वैसा कर्म वह करता है और उन कर्मों की भावना में मिला भटकता