योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 899, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
मलिन चित्त कहाता है। जब वही मलिनरूप अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होता है, तब शुद्ध होता है।
हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् आत्मस्वरूप है और शिलाघन की नाईं अद्वैत और सब विकारों से रहित है। इसका न उदय होता है और न अस्त। संकल्प के वश से जीवभाव को प्राप्त होता है और संकल्प के निवृत्त होने पर परमात्मारूप हो जाता है। हे मुनीश्वर ! आदि चित्तकला जीवरूपी रथ पर आरूढ़ है; जीव अहंकाररूपी रथ पर आरूढ़ है; अहंकार बुद्धिरूपी रथ पर आरूढ़ है; बुद्धि मनरूपी रथ पर आरूढ़ है; मन प्राणरूपी रथ पर चढ़ा है और प्राण इन्द्रियरूपी रथ पर चढ़े हैं। इन्द्रियों का रथ देह है और देह का रथ पदार्थ है। जो कर्म इन्द्रियाँ करती हैं, उसी के वश हो जरामरणरूपी संसार-पिंजड़े में भ्रमती हैं। इस प्रकार यह चक्र चलता है और उसमें प्रमाद करके जीव भटकता है। हे मुनीश्वर ! आत्मा का आभास यह चक्र विरूप है। जैसे स्वप्नपुर में जो नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं, वे वास्तव में कुछ नहीं हैं, वैसे ही यह जगत् वास्तव में कुछ नहीं है। जैसे मृगतृष्णा की नदी भ्रम से भासित होती है, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासित होता है। हे मुनीश्वर ! मन का रथ प्राण है। जब प्राणकला चेतना से रहित होती है, तब मन भी स्थिर हो जाता है और मन के स्थिर होने पर मन का मनन भी शान्त हो जाता है। जब प्राणकला चेतती है, तब मन का मनन भी चेतता है और जब प्राणकला स्थिर होती है, तब मनन निवृत्त हो जाता है। जैसे प्रकाश बिना पदार्थ नहीं दीखते और वायु के बिना धूल नहीं उड़ती, वैसे ही प्राण के स्फुरण से रहित मन शान्त हो जाता है। जैसे जहाँ पुष्प होते हैं वहाँ गन्ध होती है और जहाँ अग्नि है वहाँ उष्णता होती है, वैसे ही जहाँ प्राणस्पन्दन होता है, वहाँ मन भी होता है। हृदय में जो नाड़ी है, उसमें प्राण स्वतः चेतते हैं और उसी से मनन होता है। संवित् स्वच्छ रूप है। वह जड़-चेतन सर्वत्र भासती है और संवेदन प्राणकला में चेतती है।
हे मुनीश्वर ! आत्मसत्ता सर्वत्र अनुस्यूत होने पर भी जहाँ प्राण-