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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 898, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 898

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८७

स्वरूप नहीं भासित होता । जब यह जगतसत्ता स्फुरण सहित दूर होगी, तब आत्मतत्त्व ज्ञात होगा और जगत् की असत्यता प्रतीत होगी ।

हे मुनीश्वर ! जब शुद्ध संवित् में चेतनता का चेतना निवृत्त होता है, तब जीव अहंताभाव को प्राप्त होता है और अहंकार को प्राप्त होने से अविनाशिरूप को विनाशी जानता है । हे मुनीश्वर ! स्वरूप से कुछ भी उत्थान होता है तो उससे स्वरूप से गिरकर कष्ट पाता है । जैसे पहाड़ से गिरी चीज नीचे चली जाती है और चूर्ण हो जाती है, वैसे ही जब जीव स्वरूप से उत्थान होता है और अनात्मा में अभि- मान और अहं प्रतीति होती है, तब जीव अनेक दुःखों को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! सब पदार्थों की सत्ता आत्मरूप में है । उसके अज्ञान से जीव द्वैतत्व को प्राप्त होता है । जब उसका बोध होगा, तब द्वैतभाव निवृत्त हो जायगा । वह आत्मा शुद्ध और चिन्मात्र स्वरूप है । उसी की सत्ता से देह-इन्द्रियादिक भी चेतन होते और अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं । जैसे सूर्य के प्रकाश से सब जगत् का व्यवहार होता है, प्रकाश के बिना कोई व्यवहार नहीं होता, वैसे ही आत्मा की सत्ता से देह, इन्द्रियादिक का व्यवहार होता है और वे अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं । हे मुनीश्वर ! जो नेत्र में मुख्य श्यामता है; वह अपने आपमें रूप को ग्रहण करती है । उसका बाहर के विषय से संयोग होता है और उस रूप का जिसमें अनुभव होता है, वही परम चैतन्यसत्ता है । त्वचा इन्द्रिय और स्पर्श का जब संयोग होता है, तब इन जड़ों का जिससे अनुभव होता है, वही साक्षीभूत परम चैतन्यसत्ता है । नासिका इन्द्रिय का जब गन्ध तन्मात्रा से संयोग होता है, तब उसके संयोग में जो अनुभवसत्ता है, वही परम चैतन्य है । इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इन पाँचों विषयों को श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना, नासिका, इन पाँचों इन्द्रियों से मिलकर जानने- वाला साक्षीभूत परम चैतन्य आत्मतत्त्व है । वह मुख्य संवित् परम चैतन्य कहलाता है, और जो बहिर्मुख चेतकर दृश्य से मिला है, वह