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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 897, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 897

८६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

को सत् जानकर भावना करना । इस भावना से सब अनर्थ निवृत्त हो जाते हैं । पर यह और किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती अपने आप ही प्राप्त होती है और अनादि ही सिद्ध है । जब उस आत्मा की ओर भावना होती है, तब सब भ्रम मिट जाते हैं और जब अनात्म भावना होती है, तब उसका पाना कठिन होता है । जो यत्न के साथ है सो यत्न बिना नहीं पाया जाता । आत्मा निर्विकल्प, अद्वैत और सबसे अतीत है, उसे अभ्यास बिना कैसे पा सकते हैं ? आत्मतत्त्व परम, एक स्वच्छ, तेज का भी प्रकाशक, सर्वगत, निर्मल, नित्य सदा उदित, शक्तिरूप, निर्विकार और निरञ्जन है । घट, पट, वट, वृक्ष, गादी, वानर, दैत्य, देवता, समुद्र, हाथी इत्यादि स्थावर-जङ्गमरूप जो कुछ जगत् है, सबका साक्षीरूप होकर आत्मतत्त्व स्थित है और दीपक की तरह सबको प्रकाशित करता है । आप सर्वक्रियातीत है, पर उसी से सब कार्य सिद्ध होते हैं । वह सर्वक्रियासंयुक्त भासित होता है और सर्वविकल्प से रहित जड़वत् भी भासित होता है । परन्तु वास्तव में परम चैतन्य है । आत्मतत्त्व सब चेतन का सार चेतन, निर्विकल्प और परमसूक्ष्म है और अपने आपमें किञ्चन ही भासित होता है । अपने ही प्रमाद से रूप, अवलोक और नमस्कार की त्रिपुटी भासित होती है; जब बोध होता है तब ज्यों का त्यों आत्मा भासित होता है । नित्य, शुद्ध, निर्मल और परमानन्दरूप के प्रमाद से चैतन्य चित्तभाव को प्राप्त होता है । जैसे साधु भी दुर्जन के संग से असाधु हो जाते हैं, वैसे ही अनात्मा के संग से यह नीचता को प्राप्त होता है । जैसे सोना दूसरी धातु के मेल से खोटा हो जाता है और जब शोधा जाता है, तब शुद्धता को प्राप्त होता है, वैसे ही अनात्मा के संग से यह जीव दुःखी होता है । जब अभ्यास और यत्न करके अपने शुद्ध रूप को पाता है, तब वही हो जाता है । जैसे मुख के श्वास से दर्पण मलिन हो जाता है तो उसमें मुख नहीं देख पड़ता, पर जब मलिनता मिट जाती है तब शुद्ध होता है और उसमें मुख स्पष्ट देख पड़ता है, वैसे ही चित्त संवेदन के प्रमाद से चेतने के कारण जगत्-भ्रम भासित होने लगता है और आत्म-