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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 905, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 905

६४ योगवासिष्ठ

जाती है तो उसकी भावना करके रागद्वेष से क्षुब्ध होता है, पर जब काकतालीय न्याय से अकस्मात् हृदय में विचार उपजता है तब संकल्प-रूपी आवरण दूर हो जाता है और जीव अपने वास्तव स्वरूप को प्राप्त होता है। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वेताल की कल्पना कर भय पाता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भय पाता है।

हे मुनीश्वर ! यह जो कुछ जगत भासित होता है, सो सब संकल्प-मात्र है। जैसा संकल्प हृदय में दृढ़ होता है, वैसा ही भासित होने लगता है। प्रत्यक्ष देखो कि जो पुरुष कुछ कार्य करता है तो कर्तृत्व-भाव उसके हृदय में दृढ़ होता है और कहता है कि यह कार्य मैं न करूँ। जब यही संकल्प दृढ़ होता है, तब यह उस कार्य का अपने को अकर्ता जानता है वैसे ही दृश्य की भावना से जगत् दृढ़ सत्य हो गया है। जब दृश्य का संकल्प निवृत्त होता है और जीव आत्मभावना में लगता है, तब जगत् का भ्रम निवृत्त हो जाता है और आत्मा ही देख पड़ता है। हे मुनीश्वर ! परमार्थ दृष्टि से द्वैत कुछ है ही नहीं, सब संकल्प की रचना है। संकल्प से रचा जो दृश्य है उसका संकल्प के अभाव से अभाव हो जाता है। मनोराज्य और गन्धर्व-नगर मन से रचित होता है, और संकल्प के अभाव से उसका अभाव हो जाता है। तब कुछ क्लेश नहीं रहता। हे मुनीश्वर ! जगत् संकल्प की तुष्टि से जीव दुःख का भागी होता है, जैसे स्वप्न में संकल्प करके जीव दुःखी होता है। इस संकल्पमात्र की इच्छा त्यागने में क्या कृपणता है ? जैसे स्वप्न में जो सुख भोगता है, वह सुख भी कुछ वस्तु नहीं, भ्रममात्र है, वैसे ही यह सुख भी भ्रममात्र है। हे मुनीश्वर ! संकल्प-विकल्प ने जीव को दीन किया है। जब वह संकल्प-विकल्प का त्याग करता है, तब चित्त अचित्त हो जाता है और ऊँचे पद में विराजमान होता है। जिस पुरुष ने विवेकरूपी वायु से संकल्परूपी मेघ को दूर किया है, वह परम निर्मल हो जाता है। जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही संकल्प-विकल्परूपी मल से रहित जीव उज्ज्वलभाव को प्राप्त होता है। संकल्प के त्याग में जो शेष रहता है, वह सत्तामात्र