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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 906, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 906

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ६५

परमानन्द तुम्हारा स्वरूप है। हे मुनीश्वर! आत्मा सर्वशक्तिरूप है। जैसी भावना होती है, वैसा ही मनुष्य उसे अपनी भावना से देखता है। इस कारण सब संकल्पमात्र है; भ्रम से उदय हुआ है और संकल्प के लीन होने से सब लीन हो जाता है। हे मुनीश्वर! संकल्परूपी लकड़ी और तृष्णारूपी घृत से जन्मरूपी अग्नि को यह जीव बढ़ाता है और फिर उसका अन्त कदापि नहीं होता। जब असंकल्परूपी वायु और जल से इसको बुझावे, तब शान्त हो जाती है। जैसे दीपक का निर्वाण हो जाता है, वैसे ही जन्मरूपी अग्नि बुझ जाती है। जीव संकल्परूपी वायु से तृष्णा की नाईं भ्रमता है। हे मुनीश्वर! तृष्णारूपी कञ्ज की बेलि को जीव संकल्परूपी जल से सींचता है। जब असंकल्प-रूपी शोषण और विचाररूपी खड्ग से इसे काटे, तभी इसका अभाव होता है। जो अभावमात्र है, उसका आभास का क्षय होने पर अभाव हो जाता है। जैसे गन्धर्वनगर होता है, वैसे ही यह जगत् असम्यक् ज्ञान से भासित होता है और सम्यक्ज्ञान में लीन हो जाता है। जैसे कोई राजा स्वप्न में अपने को रङ्क देखे और पहले का स्वरूप भूलकर दीनता को प्राप्त हो, पर जब पहले का स्वरूप स्मरण आता है, तब अपने को राजा जानता है और दुःख मिट जाता है, वैसे ही जीव को जब अपना वास्तव पूर्व स्वरूप भूल जाता है, अपने को परिच्छिन्न, दीन और दुःखी जानता है, पर जब स्वरूप का ज्ञान होता है, तब सब दुःख मिट जाता है और जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही निर्मल हो जाता है। जैसे वर्षाकाल के मेघ न रहने पर आकाश निर्मल होता है, वैसे ही अज्ञानरूपी मल से रहित जीव निर्मल होकर शुद्धपद को प्राप्त होता है जो ऐसी युक्ति से भावना करता है कि मैं एक आत्मा और द्वैत से रहित हूँ, वह वही होता है और द्वैत का अभाव हो जाता है। तब उत्तमपद ब्रह्म देव पूज्य, पूजक और पूजा का भेद मिटकर किञ्चित् निष्किञ्चन की भाँति चित्त एकरूप हो जाता है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोदैवप्रतिपादन-
न्नामद्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३२ ॥