योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 907, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ ❇ योगवाशिष्ट ❇
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! वह देव निरन्तर स्थित है। वह द्वैत और एक पद से रहित है; द्वैत और संयुक्त एक भी वही है। संकल्प में मिल-कर चेतनरूप संसार को प्राप्त हुआ है। जो संकल्प के मल से रहित है, वह संसार से रहित है, 'मैं हूँ' इसी संकल्प से वन्धन होता है जब इस भाव से मुक्त होता है, तब सुख-दुःख का अभाव हो जाता है और शुद्ध निरञ्जन एकसत्ता सर्वात्मा आकाश सा व्यापक होता है। इसी का नाम मुक्ति है। ब्रह्म आकाश सा व्यापक है। वशिष्ठजी बोले, हे प्रभो ! जब मन में मन क्षीण होता है और इन्द्रियाँ मन में लीन होती हैं तब वह द्वितीय और तृतीयपद किसकी भाँति शेष रहता है ? जो महा सत्ता आत्मसत्ता सबको अपने में लीन करती है, वह किसकी तरह है ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जब मन मे मन को, जिसके अंग इन्द्रियाँ हैं, विचार करके वश में करता है, अथवा उपासना करके आत्म बोध प्राप्त करता है, तब द्वैत व एक की कल्पना नष्ट होती है और जगञ्जाल की सत्ता नष्ट हो जाती है। उसके पीछे जो शेष रहता है, वही आत्मतत्त्व प्रकाश पाता है। जैसे भुने बीज में अंकुर नहीं उप-जता, वैसे ही जब मन का उपशम होता है, तब उसमें जगत् की सत्ता का अभाव हो जाता है और चैतन्यसत्ता चित्तसत्ता को अपने में लीन कर लेती है। जब मनरूपी मेघ की सत्ता नष्ट होती है, तब शरत्काल के आकाश सी निर्मल आत्मसत्ता भासित होती है। जब चित्त की चञ्चलता मिट जाती है, तब परम निर्मल पावन चिन्मात्रतत्त्व प्राप्त होता है। एक और द्वैत तथा भाव-अभावरूप संसार की कल्पना मिट जाती है और सम सत्तारूप तत्त्व, जो सर्वव्यापक और संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, प्राप्त होता है। तब सुषुप्त की तरह निर्भय बोध हो जाता है और शान्तिरूप आत्मा को पाकर जीव शान्तरूप हो जाता है। हे मुनीश्वर ! मन की क्षीणता का यह प्रथमपद तुमसे कहा है। अब द्वितीयपद सुनो।
जब चित्तशक्ति मन के मनन से मुक्त होती है, तब चन्द्रमा के प्रकाश सा शीतल हो जाता है; आकाश सा विस्तृत अपना रूप