योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 908, कुल 1734 में से
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☀️ योगवाशिष्ठ ☀️
होता, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। सम सत्ता शिव शान्ति रूप और अनिर्वचनीय है। इसकी चतुर्थमात्रा तुरीयपद परमशान्त है।
इतना कह वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज! इस प्रकार जब ईश्वर ने कहा और परम शान्तिरूप आत्मतत्त्व का प्रसङ्ग वशिष्ठजी ने सुना, तब दोनों की वृत्ति आत्मतत्त्व में स्थित हो गई और वे मौन हो गये, मानो चित्र लिखे हों। एक मुहूर्त पर्यन्त दोनों के चित्त की वृत्ति ऐसी ही रही। फिर ईश्वर जागे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने परमेश्वरोपदेशो नाम त्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३३ ॥
वाल्मीकिजी बोले कि एक मुहूर्त उपरान्त सदाशिवजी ने तीनों नेत्र खोले तो जैसे पृथ्वीरूपी संपुट से सूर्य निकले वैसे ही उनके नेत्र निकले और जैसे द्वादश सूर्य का प्रकाश इकट्ठा हो, वैसे ही उनका प्रकाश हुआ। उन्होंने देखा कि वशिष्ठजी के नेत्र मूँदे हुए हैं। तब कहा कि हे मुनीश्वर! जागो, अब नेत्र क्यों मूँदे हो? जो कुछ देखना था सो तो तुमने देखा, अब समाधि लगाने का श्रम किस लिए करते हो? तुम सरीखे तत्त्ववेत्ताओं को कुछ हेय या उपादेय नहीं होता। तुम जैसे बुद्धिमान् हो, वैसे ही आत्मदर्शी भी। जो कुछ पाने योग्य था, सो तुमने पाया और जानने योग्य जाना। बालकों के बोध के निमित्त जो तुमने मुझसे पूछा था, सो मैंने कहा। अब तुम चुप क्यों हो?
हे राम! इस प्रकार कहकर सदाशिव ने मेरे भीतर प्रवेश करके चित्त की वृत्ति से जगाया और जब मैं जागा तब फिर ईश्वर ने कहा, हे वशिष्ठ! इस शरीर की क्रिया का कारण प्राणस्पन्दन है। प्राणों से ही शरीर की चेष्टा होती है। उसमें आत्मा उदासीन की तरह स्थित है। वह न कुछ करता है, न भोगता है। जब जीव को अपने स्वरूप का प्रमाद होता है, तब देह में अभिमान होता है और वह अपने को कर्त्ता और भोक्ता मानता है, इससे दुःख पाता और इस लोक-परलोक में भटकता है। जब आत्मविचार उपजता है, तब आत्मा का अभ्यास होता है; देहाभिमान मिट जाता है और दुःख से मुक्त होता है। शरीर-