योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 909, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६६
के नष्ट होने पर आत्मा का नाश नहीं होता । शरीर चेतन होकर प्राणों से चेतता है; जब प्राण निकल जाते हैं, तब शरीर मूक जड़रूप हो जाता है । चलाने और पवित्र करनेवाली जो संवित्शक्ति है, वह आकाश से भी सूक्ष्म है । वह शरीर का नाश होने पर नष्ट नहीं होती और जब नाश नहीं होती तब नाश का भ्रम कैसे हो ? हे मुनीश्वर ! आत्मतत्त्व ब्रह्मसत्ता सर्वत्र है, परन्तु वहीं भासित होती है जहाँ सात्त्विक गुण का अंश मन और प्राण होते हैं । मन और प्राणों सहित देह भासित होती है । जैसे निर्मल दर्पण में जब मुख का प्रतिबिम्ब दिखता है और आदर्श मलिन होता है, तब मुख विद्यमान भी होता है, परन्तु नहीं भासित होता, वैसे ही मन और प्राण जब देह में होते हैं, तब आत्मा भासित होती है और जब मन और प्राण निकल जाते हैं तब मलिन शरीर में आत्मसत्ता नहीं भासित होती । हे मुनीश्वर ! आत्मसत्ता सब जगह पूर्ण है, परन्तु भासित नहीं होती । जब उसका अभ्यास होता है, तब सर्वात्मरूप होकर भासित होती है । वही सर्वकलना से रहित शुद्ध शिवरूप सबकी सत्तरूप है । विष्णु, शिव, ब्रह्मा, देवता, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, सूर्यादिक सब जगत् का आदि-शरीर वही है । वह एक देव शुद्ध चैतन्यरूप सब देवों का देव है । सब उसके दास और उसके चित्त का उल्लास हैं ।
हे मुनीश्वर ! इस जगत् में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र जो बड़े देवता हैं, वे उसी तत्त्व से प्रकट हुए हैं । जैसे अग्नि से चिनगारी उपजती है और समुद्र से तरङ्गं प्रकट होती हैं, वैसे ही हम उससे प्रकट हुए हैं । यह अविद्या भी उसी से प्रकट है और अनेक शाखाएँ उसकी हुई हैं । देव, अदेव, वेद और वेद के अर्थ और जीव सब उस अविद्या की जटा है । ये अनन्त हैं, फिर-फिर उपजती और मिटती हैं । देश, काल, पृथिवी आदिक भी सब उसी से उत्पन्न हैं । वही सर्वसत्तारूप आत्मदेव है । हम ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र का परमपिता आत्मा ही है । सबका मूल बीज वही देव है, सब उससे उपजे हैं । जैसे वृक्ष से पत्ते उपजते हैं, वैसे ही सब उसी महादेव से उपजते हैं । सबका अनुभवकर्ता, सबको सत्ता देनेवाला