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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 910, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 910

१०० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

और सब प्रकाशों में प्रकाशक वही है। वह तत्त्ववेत्ताओं का पूज्य है, सबमें प्रत्यक्ष है और सर्वदा सब प्रकार सबमें उदित आकार चैतन्य अनुभवरूप है। उसके आवाहन में मन्त्र, आसन आदि सामग्री न चाहिए, क्योंकि वह सर्वदा अनुभवरूप से प्रत्यक्ष है और सब प्रकार सब जगह विद्यमान है। जहाँ-जहाँ उसके पाने का यत्न करिये, वहाँ-वहाँ पहले से ही विद्यमान है। वह शिवतत्त्व आदि से ही सिद्ध है और मन वाणी में तीनों रूपों में वही भासित होता है। वह सबका आदि पूज्य, नमस्कार करने और जानने योग्य है। हे मुनीश्वर ! जरा, मृत्यु, शोक और भय को मिटानेवाला ऐसा जो आत्मतत्त्व है, उसको जीव आपसे आप ही देखता है और उसका साक्षात्कार होने पर चित्त भुने बीज की नाईं हो जाता है, फिर उसमें कोई कर्मवासना नहीं उगती। वह शिवतत्त्व जीव का भी बीज है। सब पदों का पद वही है। अनुभवरूप आत्मा ही परम-पद है। भिन्नदृष्टि का त्याग करो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देवनिर्णयो नाम चतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३४ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! वह चितरूप तत्त्व सबके भीतर स्थित है। अनुभवरूप शुद्ध देव ईश्वर और सब बीजों का बीज वही है। सब सारों का सार, कर्मों का कर्म और धर्मों का धर्म, चैतन्यतत्त्व, निर्मल-रूप, सब कारणों का कारण और आप अपना कारण वही है। वह सब भाव और अभाव का प्रकाशक और परम प्रकाशरूप सब चेतनों की चैतन्यसत्ता है। वह भौतिक प्रकाश से रहित अलौकिक प्रकाश सब जीवों का जीव है। चैतन्य घन निर्मल आत्मा अस्ति-तन्मयरूप, सत्-असत् से रहित महामतरूप है। सब सत्ताओं की सत्ता वही है। वही चिन्मात्रतत्त्व नानारूप हो रहा है। जैसे एक ही आत्मसत्ता स्वप्न में आकाश, स्कन्ध, पहाड़ आदि होकर भासित होती है। वैसे ही नाना रङ्ग-रूप से वही भासित होता है। जैसे सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी अनेक कोटि किरणों से अनेक तरङ्ग संयुक्त जान पड़ती है, वैसे ही यह जगत् उसमें भासित होता है।