योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 911, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १०१
हे मुनीश्वर ! उसी आत्मतत्त्व का आभास यह प्रकाश है, उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे अग्नि से उष्णता भिन्न नहीं—वही है, वैसे ही आत्मा से जगत् भिन्न नहीं, वही है। सुमेरु भी उसके आगे परमाणुरूप है। सम्पूर्ण काल उसका एक निमेषरूप है। कल्प भी उसकी पलकों के निमेष और उन्मेष की तरह उदय और लय होते हैं। सप्त-समुद्र-संयुक्त पृथ्वी उसके रोम के अग्र भाग की तरह तुच्छ है। ऐसा वह देव है। वह संसार की रचना नहीं करता और कर्तृत्व को प्राप्त होता है। बड़े कर्मों को करता प्रतीत होता है, तो भी कुछ नहीं करता। द्रव्यरूप देख पड़ता है तो भी द्रव्य से रहित है। निर्द्रव्य होकर भी द्रव्यवान् है। देह-धारी नहीं, तो भी देहधारी है और बड़ा देहधारी होकर भी अदेह है। सबकी सत्तारूप वही देव है। ठंढी, भोलि, घले, मत्तचुल, पिंडली, माँगले, वेल, बिलिमिला, लोबलाग, युगल, सभम इत्यादि वाक्य निरर्थक हैं, इनका अर्थ कुछ नहीं, तो भी उस देव से सिद्ध होते हैं। ऐसा कुछ नहीं, जो उस देव में असत् नहीं, और ऐसा भी कुछ नहीं, जो उस देव से सत् नहीं। हे मुनीश्वर ! जिससे यह सब है, जो यह सब है और सबमें नित्य है, उस सर्वात्मा को मेरा नमस्कार है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महेश्वरवर्णनन्नाम पञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३५ ॥
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! शब्द की सत्ता वही है। सर्वसत्ता रत्नों का संपुट वही है। वही तत्त्व चमत्कार करके प्रकट होता है। जैसे जल ही तरङ्ग, फेन बुलबुले आदि के आकार में देख पड़ता है, वैसे ही वह देव नाना प्रकार के आकार रखकर प्रकट होता है। वही फल और गुच्छे के रूप में स्थित होता है और वही उनमें सुगन्ध है। घ्राण इन्द्रिय में स्थित होकर आप ही उसे सूँघता है। आप ही त्वचा इन्द्रिय होता है। आप ही पवन होकर चलता है। आप ही ग्रहण करता है। आप ही जलरूप होता है। आप ही वायु होकर सुखाता है। आप ही श्रवणेन्द्रिय और आप ही शब्द होकर ग्रहण करता है। इसी प्रकार जिह्वा, त्वचा, नासिका कर्ण और नेत्र होकर आप ही स्पर्श, रूप, रस,