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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 912, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 912

१०९ 卐 योगवासिष्ठ 卐

गन्ध और शब्द को ग्रहण करता है। उसी ने सब पदार्थ रचे हैं। उसी ने नीति रची है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, शिव और पञ्चम ईश्वर सदाशिव तक वही देव इस प्रकार हुआ है। आप ही साक्षी की तरह स्थित होता है। जैसे दीपक के प्रकाश से मन्दिर की सब क्रियाएँ होती हैं, वैसे ही संसाररूपी मण्डप की सब क्रियाएँ उसी साक्षी से होती हैं। उसमें उसकी शक्ति नृत्य करती है और वह आप साक्षिरूप होकर देखता है।

वशिष्ठजी बोले कि फिर मैंने पूछा, हे जगत् के नाथ ! शिव की शक्ति क्या है, कैसे स्थित है ? देव को साक्षात् कैसे करते हैं और उसका नृत्य कैसे होता है ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! आत्मतत्त्व स्वभाव से अचल और शान्तरूप है। शिव परमात्मा निर्मल चिन्मात्ररूप और निराकार है। उसकी शक्ति इच्छा और काल, नीति, मोह, ज्ञान, क्रिया कर्तृत्व आदि शक्तियाँ हैं। उन शक्तियों का अन्त नहीं। वह अनन्त रूप चिन्मात्रदेव है। यह जो मैंने तुमसे शक्ति कही, वह भी शिवरूप है, भिन्न नहीं। शिव और शक्ति एकरूप हैं, और बहुत भासित होते हैं। जैसे पदार्थों में अर्थ-शक्ति और आत्मा में साक्षी-शक्ति कल्पित है, वैसे ही कालशक्ति नर्तक की नाईं ब्रह्माण्डरूपी नृत्यमण्डल में नृत्य करती है। क्रिया-शक्ति भी कर्तृत्व से नृत्य करती है। वही शक्ति कहलाती है। जैसे आदि नीति हुई है, ब्रह्मा से लेकर तृण तक वैसे ही स्थित है—अन्यथा नहीं होती। हे मुनीश्वर ! यह सम्पूर्ण जगत् नृत्य करता है। संसाररूपी नाटिनी की प्रेरणा करनेवाली नीति है और परमेश्वर परमात्मा साक्षिरूप है। वह सदा उदित प्रकाशरूप और एकरस स्थित है। नीति आदिक शक्तियाँ भी उससे भिन्न नहीं। वे उसी का रूप हैं—इससे सब कुछ देव ही जानो, द्वैत नहीं।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने नीति-नृत्यवर्णनन्नाम षट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! उसी एक देव परमात्मा की साधु-सन्त-भक्त-पूजा करते हैं। वह चिन्मात्र अनुभव आत्मा घटपटादिक सबसे स्थित है, ब्रह्मा, इन्द्रादिक देवता और जीव, सबके भीतर-बाहर भी