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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 913, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 913
  • निर्वाण प्रकरण * १०३

वही स्थित है। उस सर्वात्मा शान्तरूप देव का पूजन दो प्रकार से होता है। उस इष्टदेव का पूजन ध्यान है, और ध्यान ही पूजन है। जहाँ-जहाँ मन जाय, वहाँ-वहाँ लक्ष्यरूप आत्मा का ध्यान करे। सबका प्रकाशक आत्मा ही है। वह चिद्रूप अनुभव से हृदय के भीतर स्थित और अहंता में सिद्ध है। वही सबका सार और सबका आश्रयरूप है। उसका जो विराट्-रूप है, अब सुनो। वह अनन्त है। परमाकाश उसकी ग्रीवा है। अनेक पाताल उसके चरण हैं। अनेक दिशाएँ उसकी भुजा हैं। सब प्रकाश उसके शास्त्र हैं। हृदयकोश कोण में स्थित है। ब्रह्माण्ड समूह को परंपरा में वह प्रकाशित करता है। परमाकाश अपाररूप है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादि देवता और जीव उसकी रोमावली है। त्रिलोकी में जो देहरूपी यन्त्र हैं, उनमें इच्छादिक शक्तिरूप सूत्र व्याप्त है, जिसमें सब चेष्टा करते हैं। वह देव एक भी है और अनन्त भी। सत्तामात्र उसका स्वरूप है, सब जगज्जाल उसका विवर्त है, काल उसका द्वारपाल है और पर्वतादिक ब्रह्माण्ड जगत् उसकी देह के किसी कोण में स्थित है। उस देव का चिन्तन करो। उसके सहस्र चरण, सहस्र नेत्र, शीश, भुजा और भुजाओं के विभूषण हैं। सर्वत्र उसकी नासिका इन्द्रिय है, सर्वत्र रसना इन्द्रिय है, सर्वत्र त्वचा इन्द्रिय है, सब ओर मन है, पर वह सब मननकला से अतीत है। सब ओर वही शिवरूप सर्वदा और सबका कर्त्ता है, सब संकल्पों के अर्थ का फलदायक है और सर्वभूत के भीतर स्थित और सब साधनों को सिद्ध करता है। ऐसा देव सबमें सब प्रकार और सर्वदा स्थित है। उसी देव का चिन्तन करो और उसी देव के ध्यान में सावधान रहो। सदा उसी के आश्रय रहना उस देव का बाहरी पूजन है। अब भीतर का पूजन सुनो।

हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! संवित्मात्र जो देव है, वह सदा अनुभव में प्रकाशित होता है। उसका पूजन दीपक से नहीं होता; न धूप, पुष्प, चंदन-लेप और केसर से होता है। अर्घ्य, पाद्यादिक पूजा की सामग्रियों से भी उस देव का पूजन नहीं होता। उसका पूजन तो अनायास नित्य ही होता है। हे मुनीश्वर! एक अमृतरूपी जो बोध है, उससे उस देव