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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 914, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 914

१०४ योगवाशिष्ठ

का सजातीय प्रत्यय ध्यान करना ही उसका परम पूजन है । हे मुनीश्वर ! शुद्ध चिन्मात्र देव अनुभवरूप है । उसका सर्वदा और सब प्रकार पूजन करो; अर्थात् देखना, स्पर्श करना, सूँघना, सुनना, बोलना, देना, लेना, चलना, बैठना इत्यादि जो कुछ क्रियाएँ हैं, सब चैतन्य साक्षी में अर्पण करो और उसी के परायण बनो । इस प्रकार आत्मदेव का पूजन करो । हे मुनीश्वर ! आत्मदेव का ध्यान करना ही धूप-दीप है और पूजन की सब सामग्री यही है । ध्यान ही उस देव को प्रसन्न करता है और उससे परमानन्द प्राप्त होता है । और किसी प्रकार से वह देव नहीं प्राप्त होता । हे मुनीश्वर, मूढ़ भी इस प्रकार ध्यान से उस ईश्वर की पूजा करे तो त्रयोदश निमेष में जगत्-दान के फल को पाता है । सत्रह निमेष के ध्यान से प्रभु को पूजे तो अश्वमेधयज्ञ के फल को पाता है । और केवल ध्यान से आत्मा का एक घड़ी पर्यन्त पूजन करे तो राजसूययज्ञ के फल को पाता है । जो दो प्रहर पर्यन्त ध्यान करे तो लक्ष राजसूययज्ञ के फल को पाता है और जो दिन भर ध्यान करे तो असंख्य अमित फल पाता है । हे मुनीश्वर ! यह परम योग है यही परम क्रिया है और यही परम प्रयोजन है । हे मुनीश्वर ! दोनों पूजाएँ मैंने तुमसे कहीं । जो यह परमपूजा करता है, वह परमपद को पाता है । उसको सब देवता नमस्कार करते हैं और वह पुरुष सबका पूजनीय होता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने अन्तर्बाह्य-
पूजावर्णनंनाम सप्तत्रिंशत्तमसर्गः ॥ ३७ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! अब तुम अभ्यन्तर का पूजन सुनो । वह सर्वत्र पवित्र करनेवाले को भी पवित्र करता है और सब तम और अज्ञान का नाश करता है । मैं वह आत्मपूजन तुमसे कहता हूँ, जो सब प्रकार से सर्वदा होता है और व्यवधान कभी नहीं पड़ता; चलते, बैठते, जागते, सोते सब व्यवहारों में नित्य ध्यान में रहता है। हे मुनीश्वर ! इस संसार में संवितरूप चिन्मात्र नित्य स्थित है । उसका पूजन करो । जो सब प्रत्ययों का कर्त्ता और सदा अनुभव मे प्रकाशित