योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १०५
होता है, उसका अपने में आप पूजन करो। उठते, चलते, खाते, पीते जो कुछ बाहर के लिए त्याग, ग्रहण और भोग हैं, सबको करते रहते भी उस देव की पूजा करो। हे मुनीश्वर! शरीर में शिवलिङ्ग चिह्न से रहित बोधरूप देव है। यथाप्राप्त में सम रहना उस देव का पूजन है। यथाप्राप्ति के समभाव में स्नान करके शुद्ध होकर बोधरूप लिङ्ग का पूजन करो। जो कुछ प्राप्त हो, उसमें रागद्वेष से रहित होना और सर्वदा साक्षीरूप अनुभव में स्थित रहना ही उसका पूजन है। हे मुनीश्वर! सूर्य के भुवन आकाश में वही सूर्य होकर प्रकाश करता है और चन्द्रमा के भुवन में चन्द्रमा होकर स्थित होता है। इनसे लेकर और भी जो पदार्थ समूह हैं, उनमें जैसी-जैसी भावना से स्फुरण हुआ है, वही रूप होकर वह देव स्थित है। हे मुनीश्वर! जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप और अद्वैत है, उसको देखना और किसी में वृत्ति न लगाना ही उस देव का पूजन है। प्राण अपानरूपी रथ पर आरूढ़ जो हृदय में स्थित है, उसका ज्ञान ही पूजन है। वही सब कर्म करता है। सब भोगों का भोक्ता, सब शब्दों को श्रवण करनेवाला, भागवतरूप और सबकी भावना करनेवाला वही परम प्रकाशरूप है। ऐसा जो संवित्तत्त्व है, उसको सर्वज्ञ जानकर उसका चिन्तन करना ही उसका पूजन है।
वह देव सब देहों में स्थित है तो भी आकाश सा निर्लिप्त निर्मल है। वह जाता भी है और नहीं जाता। प्राणरूपी आलय में प्रकाशित है; हृदय, कण्ठ, तालु, जिह्वा, नासिका और पीठ में व्यापक है, शब्द आदि विषयों को करता और मन का प्रेरक है। जैसे तिल के आश्रय तेल है, वैसे ही आत्मा सबका आश्रय है। वह कलनारूपी कलङ्क से रहित और कल्पनाओं से संयुक्त भी है। सम्पूर्ण देहों में वही एक देव व्याप रहा है। हृदय में जो प्रत्यक्ष होता है, वही निर्मल चिन्मात्र प्रकाशरूप और कलनारूपी कलङ्क से रहित सदा प्रत्यक्ष है और अपने में आप ही उसका अनुभव किया जाता है। सर्वदा सब पदार्थों का प्रकाशक, प्रत्यक चैतन्य जो आत्मतत्त्व अपने हृदय में स्थित है, वही अपने फुरने से शीघ्र ही द्वैत की तरह हो जाता है। हे मुनीश्वर! जो