योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
कुछ साकाररूप जगत् देख पड़ता है, सो सब विराट् आत्मा है। इससे अपने में इस प्रकार विराट् की भावना करो कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरी देह है; हाथ, पाँव, नख, केश है। मैं ही प्रकाशरूप एक देव हूँ। नीति इच्छादिक मेरी शक्ति हैं। सब मेरी ही उपासना करते हैं। जैसे स्त्री श्रेष्ठ भर्ता की सेवा करती है, वैसे ही शक्ति मेरी उपासना करती है। मन मेरा द्वारपाल है, जो त्रिलोकी का निवेदन करनेवाला है। चिन्तन मेरा आने-जानेवाला प्रतिहारी है। नाना प्रकार के ज्ञान मेरे अङ्ग के भूषण हैं। कर्म-इन्द्रियाँ मेरे द्वार और ज्ञान-इन्द्रियाँ मेरे गण हैं। ऐसा मैं एक अनन्त आत्मा, अखण्डरूप, भेद से रहित, अपने आपमें स्थित परिपूर्ण हूँ।
हे मुनीश्वर ! इसी भावना से जो एक देव की पूजा करता है, वह परमात्मदेव को प्राप्त होता है। दीनता आदि उसके सब क्लेश नष्ट हो जाते हैं। उसे अनिष्ट की प्राप्ति में शोक और इष्ट की प्राप्ति में हर्ष नहीं उपजता। न तोष होता है और न कोप होता है। विषय की प्राप्ति से वह तृप्ति नहीं मानता और न इसके वियोग से खेद मानता है। न अप्राप्त की वाञ्छा करता है, न प्राप्त के त्याग की इच्छा करता है। सब पदार्थों में उसका समभाव रहता है। ऐसा पुरुष उस देव का परम उपासक है। ग्रहण-त्याग न करना, सबमें तुल्य रहना और भेदभाव को प्राप्त न होना ही उस देव का उत्तम अर्चन है। हे मुनीश्वर ! मैंने चैतन्यतत्त्व देव तुमसे यह कहा। वह सब देहों में स्थित है। जो वस्तु प्राप्त हो, उसका अर्चन करके उसी के आगे रखना, सबके साक्षी आत्मा को देखना, किसी से खिन्न न होना, उसमें अहंप्रतीत रखकर भिन्न दृश्य की भावना न करना ही उस देव की अर्चना है। हे मुनीश्वर ! जो कुछ प्राप्त हो, उसमें यत्न बिना समदर्शी रहना और भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य, भोजन जो प्राप्त हो, उसे देव के आगे रखके उसमें ग्रहण-त्याग की बुद्धि न करना, यही उस देव का पूजन है। सब पदार्थों की प्राप्ति में देव की पूजा करने से अनिष्ट भी इष्ट हो जाता है। मृत्यु आवे तो वह देव की पूजा, जन्म हो तो