योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 917, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❋ निर्वाण प्रकरण ❋ १०७
वह देव की पूजा, दरिद्र आवे तो वह देव की पूजा, राग प्राप्त हो तो वह देव की पूजा। नाना प्रकार की विचित्र चेष्टाएँ सब देव के आगे पुष्पांजलि बढ़ाना है। रागद्वेष में सम रहना ही उस देव की पूजा है। मन्तों के हृदय में रहनेवाली मैत्री, अर्थात सम्पूर्ण विश्व का मित्र होना भी उस देव का पूजन है। भोग त्याग, राग में जो कुछ प्राप्त हो, उससे भी उस देव का पूजन करो। जो नष्ट हुआ सो हुआ और जो प्राप्त हुआ सो हुआ। दोनों में निर्विकार रहकर उसमें उस देव का अर्चन करो। ये भोग आपात रमणीय हैं, होते भी हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। इनकी इच्छा न करना, सदा सन्तुष्ट रहना। जैसे जो आकार प्राप्त हो, उसमें राग-द्वेष से रहित होना भी उस देव का अर्चन है।
हे मुनीश्वर! जो कुछ प्रारब्ध में प्राप्त हो, उसमें आत्मा का अर्चन करो। इच्छा-अनिच्छा को त्यागकर जो प्राप्त हो, उसमें उस देव का अर्चन करो। हे मुनीश्वर! ज्ञानवान् न किर्मी की इच्छा करता है और न त्याग करता है। जो अनिच्छित अनायास प्राप्त हो, उसको भोगता है जैसे समुद्र में नदी जा मिलती है पर वह उसमें न कुछ हर्ष मानता है, न शोक करता है, वैसा ही ज्ञानवान् इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में राग-द्वेष से रहित यथाप्राप्त को भोगता है। वह भी उस देव का पूजन है। देश, काल, क्रिया, शुभ अथवा अशुभ जो प्राप्त हो, उसमें संरक्षण विकार को प्राप्त न होना उस देव की अर्चना है। यदि द्रव्य अनर्थरूप हो तो भी ममत्व रस मिला होने से वह अमृत हो जाता है। जैसे षट्रसों के स्वाद शक्कर में मिलकर मधुर हो जाते हैं, वैसे ही अनर्थरूपी रस ममत्व रस से मिलकर अमृत हो जाते हैं। समदर्शी को उसमें खेद नहीं होता। वे अनन्त रूप हो जाते हैं। चन्द्रमा की नाईं सब भावना अमृतमय हो जाती है। जैसे आकाश निर्लेप है, वैसे ही समत्व भाव पाकर चित्त राग-द्वेष से रहित निर्मल हो जाता है। द्रष्टा को दृश्य में मिला न देखना, साक्षीरूप रहना ही देव की अर्चना है। जैसे पत्थर की शिला निष्पन्द होती है, वैसे ही विकल्प से रहित चित्त अचल होता है। वही देव की अर्चना है।