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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 918, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 918

१०८ ☀ योगवाशिष्ठ ☀

हे मुनीश्वर ! भीतर में आकाश सा असंग रहना और बाहर में प्रकृति आचार में रहना; किसी के संग का हृदय में स्पर्श न होने देना और सदा समभाव विज्ञान से पूर्ण रहना ही उस देव की उपासना है । जिसके हृदयरूपी आकाश में अज्ञानरूपी मेघ नष्ट हो गया है, उसको स्वप्न में भी विकार नहीं होता । जिसके हृदयरूपी आकाश में अहंता-रूपी कुष्टिग मिट गया है, वह शरत्काल के आकाश सा उज्ज्वल होता है । हे मुनीश्वर ! जिसको समभाव प्राप्त हुआ है, और उसमें उसने देव को पाया है, वह पुरुष ऐसा हो जाता है जैसा छोटा बालक राग-द्वेष से रहित होता है । जीवरूपी चेतना को उलंघ कर परम चैतन्य-तत्त्व जो प्राप्त होता है और सकल की इच्छा और सुख-दुःख-भ्रम में शरीर की मुक्ति होती है, वही देव की अर्चना है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे देवार्चनाविधान-नामाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३८ ॥

ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जैसी कामना हो और जो कुछ आरम्भ करे अथवा न करे, उसमे अपने में चिन्मात्र संवित्तत्त्व की अर्चना करे । इससे वह देव प्रसन्न होता है, और जब प्रसन्न हुआ, तब वह प्रकट होता है। जब उसको पाया और स्थित हुआ तब रागद्वेषादिक शब्दों का कुछ अर्थ नहीं रह जाता । जैसे अग्नि में बर्फ का कण नहीं पाया जाता, वैसे ही फिर उसमें रागद्वेषादिक नहीं पाये जाते । इससे उस देव की अर्चना करनी चाहिए । यदि राज्य अथवा दारिद्र्य व सुख-दुःख प्राप्त हो तो उसमें सम रहना ही देव की अर्चना है । हे मुनीश्वर ! शुद्ध चिन्मात्र में प्रमादी न होने का नाम ही अर्चना है । जो कुछ घटपट आदिक जगत् भासित होता है, सो सब आत्मरूप है, उसमे भिन्न कुछ नहीं । वह आत्मा शिव शान्तिरूप, अनाभास, एक, प्रकाशरूप है । सम्पूर्ण जगत् प्रतीतिमात्र है; आत्मा से भिन्न किसी द्वैत वस्तु का आभास नहीं है । सर्वात्मरूप अद्वैततत्त्व जब भासित होता है, तब उसमें प्राप्त होकर बड़ा आश्चर्य होता है। घटपटा-दिक रूप सब वही है, और कुछ नहीं । हे मुनीश्वर ! यह सब सर्वात्मा

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