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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 919, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 919

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १०६

अनन्त शिवतत्त्व है, ऐसा निश्चय जिसको हुआ है, उसने देव की पूजा जानी है। घटपट आदि पदार्थ और पूज्य-पूजा-पूजकभाव, सब ब्रह्मरूप है। निर्मलदेव आत्मा में कुछ भेद-भाव नहीं है।

हे मुनीश्वर ! आत्मदेव सर्वशक्तिमान् और अनन्तरूप है। जगत में उससे भिन्न कुछ नहीं। निर्मल प्रकाश संवितरूप आत्मा स्थित है। हमको तो ईश्वरदेव से भिन्न कुछ नहीं भासित होता। सर्वत्र, सब प्रकार वही सर्वात्मा सम्पूर्ण देख पड़ता है। जिनको देश-काल के परिच्छेद सहित ईश्वर भासित होता है, वे हमारे उपदेश के पात्र नहीं, वे ज्ञानबन्धु नीच हैं। उनकी दृष्टि को त्यागकर मेरी दृष्टि का आश्रय जो ले तो स्वस्थ, वीतराग और निरामय होकर प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ सुख-दुःख आकर प्राप्त हो उसे खेद से रहित होकर भोगे और उस देव का अर्चन करे, तब शान्ति प्राप्त हो। हे मुनीश्वर ! सब प्रकार सर्वात्मारूप से उस देव की भावना करो—यही उसका पूजन है। वृत्ति का सदा अनुभवरूप में स्थित रहना और यथाप्राप्त में खेद से रहित विचरना ही उस देव की अर्चना है। जैसे स्फटिक के मन्दिर में जो प्रतिविम्ब झलकते हैं, वे और कुछ नहीं, निष्कलङ्क स्फटिक ही है, वैसे ही सब ओर से शुद्ध और जन्मादिक दुःख से रहित निष्कलङ्क आत्मा की प्राप्ति से तुम में जन्मादिक कलङ्क या दुःख कुछ न रहेगा।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देवपूजाविचारो नामैकोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे देव ! शिव किसे कहते हैं और ब्रह्म, आत्मा, परमात्मा, तत्सत्, निष्किञ्चन, शून्य, विज्ञान इत्यादिक किसे कहते हैं ? ये भेदसंज्ञाएँ किस निमित्त हुई हैं ? कृपा करके कहो। ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जब सबका अभाव होता है, तब अनादि, अनन्त, अनाभास सत्तामात्र शेष रहता है। जो इन्द्रियों का विषय नहीं, उसे निष्किञ्चन कहते हैं। फिर मैंने पूछा, हे ईश्वर ! जो इन्द्रियाँ, बुद्धि आदि का विषय नहीं, उसे क्योंकर पा सकते हैं ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जो मुमुक्षु हैं और जिनको वेद के आश्रयसंयुक्त सात्त्विकी