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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 920, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 920

११० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

वृत्ति प्राप्त हुई है, उनको सात्त्विकीरूप जो गुह्य शास्त्रनाम की विद्या प्राप्त होती है, उसमें अविद्या नष्ट हो जाती है और आत्मतत्त्व का प्रकाश होता है, जैसे साबुन से धोबी वस्त्र का मैल उतारता है, वैसे ही गुरु और शास्त्र अविद्या को दूर करते हैं। जब कुछ काल में अविद्या नष्ट होती है, तब अपना रूप आप ही दिखता है। हे मुनीश्वर ! जब गुरु और शास्त्रों का विचार मिलकर प्राप्त होता है, तब स्वरूप की प्राप्ति होती है, द्वैतभ्रम मिट जाता है और सर्वत्र आत्मा ही झलकती है। और जब विचार द्वारा आत्मतत्त्व का निश्चय हुआ कि सर्वत्र सब कुछ आत्मा ही है, उसमें कुछ भिन्न नहीं, तब अविद्या जाती रहती है।

हे मुनीश्वर ! आत्मा की प्राप्ति में गुरु और शास्त्र प्रत्यक्ष कारण नहीं; क्योंकि जिनके क्षय होने मे वस्तु को पाइये, उनके विद्यमान होते वह वस्तु कैसे मिल सकती है ? देह इन्द्रियों सहित गुरु होता है और ब्रह्म सब इन्द्रियों से अतीत है; इनमे कैसे उसे पाइये ? ज्ञान अकारण है, परन्तु उसके कारण भी हैं, क्योंकि गुरु और शास्त्र के क्रम में ज्ञान की सिद्धि होती है और गुरु और शास्त्र के बिना बोध की सिद्धि नहीं होती। आत्मा निर्देश और अदृश्य होकर भी गुरु और शास्त्र में मिलता है, और गुरु और शास्त्र में भी नहीं मिलता, आप ही में आत्म-तत्त्व की प्राप्ति होती है। जैसे अन्धकार में पदार्थ हो और दीपक के प्रकाश से दीखे तो दीपक से उसे नहीं पाया, अपने आपमें पाया है, वैसे ही गुरु और शास्त्र भी हैं। यदि दीपक हो और नेत्र न हों, तब कैसे वस्तु को पाइये और नेत्र हों और दीपक न हो तो भी नहीं पाया जाता। जब दोनों हों, तब पदार्थ पाया जाता है। वैसे ही गुरु और शास्त्र भी हों और अपना पुरुषार्थ और तीक्ष्णबुद्धि हो, तब आत्मतत्त्व मिलता है, अन्यथा नहीं पाया जाता। जब गुरु, शास्त्र और शिष्य की शुद्ध बुद्धि, तीनों इकट्ठे मिलते हैं, तब संसार के सुख-दुःख दूर होते हैं और आत्मपद की प्राप्ति होती है। जब गुरु और शास्त्र आवरण को दूर कर देते हैं, अपने आप ही आत्मपद मिलता है, वैसे ही जैसे जब वायु बादल को दूर करती है, तब नेत्रों से सूर्य देख पड़ता है। अब