योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 921, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण प्रकरण
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नाम के भेद सुनो। जब बोध के प्रभाव से कर्म-इन्द्रियों और ज्ञान-इन्द्रियों का क्षय हो जाता है, तब उनके पीछे जो शेष रहता है, उनके नाम संवित्तत्त्व, आत्मसत्ता आदिक हैं। जहाँ ये सम्पूर्ण नहीं और इनकी वृत्ति भी नहीं, उनके पीछे जो सत्ता शेष रहती है, वह आकाश से भी सूक्ष्म और निर्मल अनन्त परम शून्यरूप है—वहाँ शून्य का भी अभाव है। हे मुनीश्वर ! जो शान्तरूप मुमुक्षु मनन-कल्पना से संयुक्त हैं, उनको जीवन्मुक्तपद के बोध के निमित्त मोक्ष उपाय ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, लोकपाल, पण्डित, पुराण, वेद, शास्त्र और सिद्धान्त रचे गये हैं और उनमें शास्त्रों ने चैतन्य ब्रह्म, शिव, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर, सत्, चित्, आनन्द आदि भिन्न-भिन्न अनेक संज्ञाएँ कही हैं, पर ज्ञानी को यह कुछ भेद नहीं।
हे मुनीश्वर ! ऐसा जो देव है, उसका ज्ञानवान् इस प्रकार अर्चन करते हैं और जिस पद के हम सब दास या कर्मचारी हैं, उस परमपद को वे प्राप्त होते हैं। फिर मैंने पूछा, हे भगवन् ! यह सब जगत् अविद्यमान है और विद्यमान की तरह स्थित है, सो यह कैसे हुआ ? यह तुम्हीं कह सकते हो। ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जो ब्रह्म आदिक नाम से कहा जाता है, वह केवल शुद्ध संवित्मात्र और आकाश से भी सूक्ष्म है। उसके आगे आकाश भी ऐसा स्थूल है, जैसा अणु के आगे सुमेरु स्थूल। उसमें जब वेदनाशक्ति आभास होकर चेतती है, तब उसका नाम चेतन होता है। फिर वह अहंताभाव को प्राप्त हुआ, जैसे स्वप्न में पुरुष अपने को हाथी देखने लगे, वैसे अपने को अहं मानने लगा। फिर देश, काल, आकाश आदि देखने लगा। तब चेतनकला जीव अवस्था को प्राप्त हुई और वासना करनेवाली हुई। जब जीवभाव हुआ, तब बुद्धि निश्चयात्मक होकर स्थित हुई और शब्द और क्रियाज्ञान से संयुक्त हुई। जब इनमे मिलकर कल्पना हुई, तब मन हुआ, जो संकल्प का बीज है। तब अन्नवाहक शरीर में अहं-रूप होकर ब्रह्मसत्ता स्थित हुई। इस प्रकार यह उत्पन्न हुई है। फिर वायुसत्ता स्पंदित हुई, जिससे स्पर्शसत्ता त्वचा प्रकट हुई। फिर तेज-